दिव्य विचार: इतने भी स्वार्थी न बनें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि यह भाव यदि मन में बना रहता है तो किसी से कोई आसक्ति नहीं होगी और किसी से कोई अपेक्षा नहीं रहेगी। जब मनुष्य का मन गहरी हताशा का शिकार हो जाता है, दुराशा छा जाती है, अपनों से ही व्यक्ति उपेक्षित महसूस करने लगता है, तो उसकी पीड़ा बहुत प्रबल हो जाती है। मैं तो समझता हूँ कि आज की इस दुनिया में जब लोगों की सोच एकदम स्वार्थी और संकीर्ण बनती जा रही है. तब कोई किसी के साथ व्यावहारिक स्तर पर आत्मीय सम्बन्ध भी नहीं रखते । प्रेम/आत्मीयता के सारे सम्बन्ध भी दिनों-दिन तार-तार होते जा रहे हैं। ऐसे समय में यदि मनुष्य शुरु से ही एकत्व की भावना से जुड़ा रहे तो पर की अपेक्षाएँ स्वतः खत्म हो जाएँगी और जहाँ अपेक्षा नहीं होगी वहाँ उपेक्षा का दंश भी नहीं झेलना पड़ेगा। अपेक्षा हो तो उपेक्षा होगी। हमने किसी से चाह रखी तो दाह मिलेगी। पर से कोई अपेक्षा ही मत रखिए। यह दृढ़ श्रद्धा बनाकर चलिए कि मेरा सुख-दुःख मुझे भोगना है और यह सब मेरे अपने कर्मों के अनुसार हैं। मैं न दूसरे का सुख-दुःख भोग सकता हूँ और न मेरे सुख-दुःख को कोई दूसरा भोग सकता है। जो पीड़ा है वह तो मुझे ही भोगना है। आनन्द है तो वह भी मुझे ही भोगना है। सुख है तो मुझे ही भोगना है और दुःख है तो वह भी मुझे ही झेलना है। कोई दूसरा मेरा साथ देने वाला नहीं है। मैं अकेला हूँ, मुझे अपनी सारी यात्रा अकेले ही भोगनी है। यह तो मेरे भीतर की भ्रान्ति है, मेरे भीतर की ममता है, मेरे अन्दर का मोह है, जो मुझे दूसरों से जोड़े रहता है और जब एक-दूसरे से बिछुड़ने लगते हैं तो व्याकुलता होने लगती है। एकत्वभावना भाने से एक तो पर-निर्भरता नहीं होती और दूसरी किसी से आसक्ति नहीं होती । हमारी बुद्धि स्वयं पर केन्द्रित होती है। इसलिए दुःख हमारे मन में कभी हावी नहीं होता। चित्त में कभी अशान्ति पनप नहीं सकती। जीवन का मार्ग अपने आप सहज और सुखद बन जाता है। यह हम समझें। वस्तुतः हम संसार में एक यात्री हैं, अतिथि हैं, आज हैं तो कल हमें भी जाना है।






