दिव्य विचार: तेरा-मेरा के फेर में मत उलझो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: तेरा-मेरा के फेर में मत उलझो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बन्धुओ ! यही हाल आजकल के प्राणियों का है। वे संसार में जन्म लेते हैं और यह सोचते हैं कि यह सारा का सारा संसार, जो कुछ है वह मैने ही किया है। यह सब मेरे लिए हुआ है। पुत्र जन्मा है तो मैने ही जन्म दिया है। वह मेरे लिए है, यह परिवार है तो मेरे लिए है। यह समाज है तो मेरे लिए है। जिंदगी भर इसी भ्रम में रहता है और जब तम्बू उखड़ना शुरु होता है तो कहता है कि - हे भगवन् ! ये कैसे हो रहा है ? ये किससे पूछकर जा रहे हैं। मेरा बेटा, मेरे बीच जा रहा है, मेरा पति मेरे बीच से जा रहा है, मेरी पत्नी मेरे बीच से जा रही है। संत कहते हैं - यह मेरा-मेरा रटते-रटते सब कुछ गंवा‌ओगे। जो तुमने यह फैलाया है वह केवल रातभर के विश्राम के लिए ही है। सुबह होते ही कब तम्बू उखड़े कोई पता नहीं और जब यह तम्बू उखड़ेगा तब तुम लाख रोओ, लाख चिल्लाओ, कोई तुम्हारा साथ देने वाला नहीं। बस यह मानकर चलो कि एक दिन तम्बू को उखड़ना है। इसलिये उसमें ज्यादा न उलझें, स्व के कल्याण की सोचूँ। अपनी आत्मा के उद्धार की बात सोचूँ, अध्यात्म हमें यही पाठ पढ़ाता है। यदि इतना करने में हम सफल हो जाते हैं, समर्थ हो जाते हैं तो फिर हमसे बड़ा सौभाग्यशाली कोई नहीं। हमारा अध्यात्म हमसे कहता है कि पर को तो देखो ही मत, स्वयं में रमो। हमारी दृष्टि हमेशा परमुखापेक्षी होती है। हम स्वयं पर केन्द्रित नहीं होते हैं। संत कहते हैं कि पर तो केवल निमित्त होता है, उपादान तो तुम हो। सुख, दुःख, जीवन, मरण, संयोग-वियोग आदि में दूसरे ऊपरी तौर पर सहायक निमित्त हो सकते हैं, लेकिन इन सबके उपादानकारण तुम ही हो, उसको पहचानो। जब तक निमित्ताधीन दृष्टि रहेगी, तुम्हारी प्रवृत्ति बहिर्मुखी होगी, तब तक चित्त अशान्त बनेगा। पर से राग के सम्बन्ध भी बुरे हैं और पर से द्वेष के सम्बन्ध भी बुरे हैं। सम्बन्ध मात्र ही बुरा है। कहा जाता है दूसरों को देखा यानि नरक को देखा, अध्यात्म यही कहता है। मतलब, स्वयं के सामने हमने यदि दूसरे को स्थापित किया, तो वहीं से आध्यात्मिक जीवन में पतन प्रारम्भ हो जाता है।