दिव्य विचार: कड़वी तुम्बी के उपयोग से तर जाओगे, उपभोग से मर जाओगे-:मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि संतों ने कहा- यह शरीर कड़वी तुम्बी की तरह है, जो जहरीली होती है। उस तुम्बी को अगर खा लिया जाय तो फूड प्वाईजन हो जाता है। बड़ी भयानक स्थिति बन जाती है। अगर कोई खा ले, तो इतनी उल्टी और दस्त होती है कि हालत खराब हो जाय । कड़वी तुम्बी खाई नहीं जाती। लेकिन उस तुम्बी का सही ढंग से उपयोग करें तो उस तुम्बी के सहारे नदी-नाले को पार किया जा सकता है। संत कहते हैं कि यह शरीर भी तुम्बी की तरह है। इसका तुम उपयोग करो, उपभोग नहीं। उपयोग करोगे तो तर जाओगे। उपभोग करोगे तो मर जाओगे। शरीर का सदुपयोग क्या है ? भगवान् की भक्ति, दीन दुखियों की सेवा, त्याग और तपस्या । आत्मा का कल्याण इसके अलावा नहीं। यह तन पाय महा तप कीजे यामें सार यही है। इस शरीर को पाकर तप करना ही सारभूत है। हमारे गुरु महाराज कहते हैं-
तन मिला तुम तप करो, करो कर्म का नाश ।
रवि शशि से भी अधिक है तुममें दिव्य प्रकाश ।
उससे भी ज्यादा प्रकाश तुम्हारे पास है। इसका सही यूज़ करो मिसयूज़ मत होने दो, अपने इस जीवन को केवल विषयों में मत भटकाओ, अपने इस दुर्लभ जीवन को भटकाना यानि हाथी पर ईधन ढोना है। अपने इस दुर्लभ जीवन को विषयों में भटकाना मतलब रत्नों की राख से अपने बर्तनों को धोना। अपने जीवन को विषयों में गँवाना मतलब चन्दन की लकड़ी से भोजन पकाना। यह अज्ञान नहीं तो और क्या है ? जो मूल्य समझता है, महत्व समझता है, वह कभी अपने जीवन का दुरूपयोग नहीं कर सकता। रत्न अगर तुम्हे मिलता है, तो उसे राख में मत बदलो। अपितु उस रत्न को पाकर खरा बनने का प्रयत्न करो। तुम मालामाल हो सकते हो। रत्न की तो फिर भी कीमत है, पर जीवन तो अनमोल है पैसे देकर रत्न खरीदा जा सकता है पर पैसे देकर जीवन नहीं खरीदा जा सकता।






