दिव्य विचार: हमेशा अनुकूलता नहीं होती- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: हमेशा अनुकूलता नहीं होती- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हर व्यक्ति यह सोचकर के चले कि मेरे जीवन में सदैव अनुकूलता ही अनुकूलता बनी रहे तो यह असंभव है। मैंने आपसे पहले भी कहा था कि संसार सपाट मैदान नहीं होता है यह तो नदी की तरह बहुत अधिक उतार-चढ़ाव वाला होता है। इसके मध्य होकर हमें आगे बढ़ने की आवश्यकता है। यह हमें करना ही पड़ेगा। हर व्यक्ति को अनुकूलता नहीं होती है। हम हर जगह देखते हैं, पिता और पुत्र के बीच मन-मुटाव होता है। पति और पत्नी के बीच में तनाव होता है। भाई-भाई के बीच खाई होती है। यह तो संसार की नीति है। यह सब तभी तक है जब तक हम अज्ञानता में जी रहे हैं। जो ज्ञानी जीव होता है वह उन सब चीज़ों को सहजता से स्वीकार करता है और प्रतिकूल को भी अनुकूल बनाने की सामर्थ्य विकसित कर अपने जीवन को धन्य कर लेता है। इसीलिये इहलोकभय, इससे क्या चिन्ता ? इष्ट का संयोग हो अथवा अनिष्ट का संयोग हो । चेतन हो अथवा अचेतन हो । अब आप दुकान चला रहे हैं। चेतन में मकान है, गाड़ी है, घोड़ा आदि हैं। अब इसमें किसी का नुकसान न हो जाये। हमारा धंधा न बैठ जाये। कुछ गड़बड़ न हो जाये। अरे, जो होना है सो होगा। ज्ञानी जीव एक ही चीज़ जानता है कि जो मेरी तकदीर में लिखा है उससे ज़्यादा कुछ नहीं हो सकता है। ये विश्वास यदि तुम्हारे हृदय में स्थापित हो जाये तो तुम्हारे लिये ज़्यादा कुछ करने और कहने की आवश्यकता ही नहीं होगी। फिर तुम्हें अपने आप राह मिलेगी। परिस्थितियाँ तो अपने आप बनती हैं। लेकिन उन परिस्थितियों के मध्य राह निकालना सबसे बड़ी कला है। वैसी राह हम निकाल लें, तो हमारा जीवन धन्य हो जायेगा। राह को निकालने में असमर्थ हैं तो हमारा जीवन दूभर है। बन्धुओ, जीवन को ध्येय भी बनाया जा सकता है और दूभर भी। दोनों स्थितियाँ हमारे ऊपर निर्भर करती हैं। हम जिस रूप में जीवन को जीने का प्रयास करते हैं, वैसा हमारा सारा काम बनता है। इसलिये ये इहलोकभय भी एक मन की दुर्बलता है। जिस मनुष्य के हृदय में ऐसी दुर्बलता हावी होती है, वह चिन्ताओं और व्यग्रताओं से घिरा रहता है।