दिव्य विचार: परमात्मा के दर्शन श्रद्धा से ही संभव- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं अब तो जो कुछ है यही मेरा सब कुछ है। इसके अलावा मेरा कोई दूसरा मार्ग नहीं है। यह आन्तरिक श्रद्धान है जिससे श्रद्धा की अभिव्यक्ति होती है। हमारे अन्दर समर्पण का भाव होता है और यही समर्पण हमारे अन्दर के अहंकार को विघटित कर देता है । बन्धुओ, अहं हमारी श्रद्धा का सबसे बड़ा बाधक तत्व है। जहाँ अहंकार आड़े आते है, वहाँ श्रद्धा विनष्ट हो जाती है। और जब श्रद्धा प्रकट होती है तो अहंकार नष्ट हो जाता है। अगर अपने भीतर के श्रद्धान को बढ़ाना है तो अहंकार को नष्ट करने की कोशिश करें। अहंकार हमारे आत्मविकास का सबसे अवरोधक तत्त्व है। यह दीवार की तरह हमारे सामने खड़ा हो जाता है। हमारे मार्ग की प्रगति को अवरुद्ध कर देता है। सारी विकास यात्रा को रोक डालता है। उस अहंकार से अपने आपको बचायें, उस अहंकार की दीवार को ढहा दें और श्रद्धा के द्वार से आगे बढ़ें। बन्धुओ, श्रद्धा ही वह द्वार है जिसके बल पर परमात्मा के प्रासाद तक पहुँचा जा सकता है। अपने भीतर के परमात्मा के दर्शन करना चाहते हो तो केवल श्रद्धा के द्वार से होकर ही संभव है और कोई दूसरा द्वार नहीं है। इसलिये धर्म की शुरूआत श्रद्धा के माध्यम से ही होती है। कहा जाता है कि श्रद्धा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। और श्रद्धालु के लिये कुछ भी असंभव नहीं है। धर्म के मार्ग की शुरूआत तुम्हारी श्रद्धा से होगी और यदि एक बार तुम्हारे अन्तःकरण में वह श्रद्धा स्थिर हो गई तो तुम्हें कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं है। सारा मार्ग अपने आप प्रशस्त हो जायेगा और तुम्हारे जीवन के कल्याण की प्रक्रिया अपने आप प्रारम्भ हो जायेगी। उस मार्ग को अपनाने की कोशिश करो। अन्दर से विश्वास हो, आन्तरिक श्रद्धान हो। कई-कई बार हमारे साथ होता यह है कि हम ऊपर से विश्वास की बात तो करते हैं लेकिन हमारा विश्वास सतही ही होता है। अन्दर अविश्वास छिपा हुआ रहता है। हम कह रहे हैं कि यही हमारे देव हैं, यही हमारे शास्त्र हैं, यही हमारे गुरु हैं, ऐसा शब्दों में तो कहते हैं लेकिन दिल के किसी कोने में अभी संदेह जमा हुआ है।






