दिव्य विचार: दुनियादारी की चीजें काम की नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं जब तक मनुष्य के हृदय में श्रद्धा की हिलोर नहीं उठती तब तक वह अपने भीतर के कल्मष को दूर करने में समर्थ नहीं हो सकता है। बुद्धि तो मनुष्य को भटका सकती है। उस शुष्क बुद्धिवाद से बचें। बुद्धि जीवन में उपयोगी है, लेकिन सिर्फ वही बुद्धि जो किसी श्रद्धा से अनुबन्धित है। बुद्धि अगर भगवान् की श्रद्धा से जुड़ी है तो हमें परमात्मा बनाने में समर्थ हो जाती है, और यदि केवल बुद्धिवाद के अहंकार से अकड़ी हुई है, तो वह हमें संसार में भटका देती है। जाने कितनी परिभाषाएँ ? चार शब्द हैं - श्रद्धा, विश्वास, बुद्धि और तर्क। ये जाने-पहचाने शब्द हैं। पर इनके अर्थ को मेरे हिसाब से समझिये। विश्वास कहता है कि मैं रात के अन्धेरे में बेधड़क चला करता हूँ। तो बुद्धि कहती है कि मैं तो दिन के उजाले में भी भटक जाती हूँ। श्रद्धा कहती है कि मैं पाषाण में भगवान के दर्शन करती हूँ। तर्क कहता है कि मैं भगवान् को भी पाषाण बना देता हूँ। ये स्थितियाँ हैं। वस्तुतः मार्ग श्रद्धा का है। श्रद्धा से ही हमारे धार्मिक जीवन की सही शुरूआत होती है। वहीं से हमारे आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त होता है इसलिये प्रथम भूमिका में श्रद्धा नितान्त ज़रूरी है, देव के प्रति, गुरु के प्रति, धर्म के प्रति और तत्त्व के प्रति । आज हम श्रद्धा की बात तो करते हैं, लेकिन हमारे अन्दर में श्रद्धा है कहाँ ? हमारी श्रद्धा संसार की चीज़ों के प्रति, सांसारिक सम्बन्धों के प्रति, सांसारिक संयोगों के प्रति है। हम अपने देव, गुरु, धर्म और अपने तत्त्व के प्रति बहुत कम श्रद्धान कर पाते हैं। अपने आपके प्रति भी मन में विश्वास नहीं है। जब कभी भी कोई आपत्ति/विपत्ति आती है तो हम दुनिया की बातों में उलझ जाते हैं। दुनिया की चीज़ों के प्रति भागते हैं। सन्त कहते हैं कि वे सब चीजें तुम्हारे लिये उतने काम की नहीं है, जितना की तुम्हारा अपना स्वरूप है। वह ही तुम्हारे लिये भव-भवान्तर में सहायक बन सकता है और कोई दूसरा नहीं। ऐसा विश्वास अगर तुम्हारे मन में जम जाये तो फिर तुम्हारे उद्धार में किसी भी प्रकार की कोई सोचने जैसी बात नहीं हैं।






