दिव्य विचार: श्रद्धा हो तो धारणा नहीं बदलती- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: श्रद्धा हो तो धारणा नहीं बदलती- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं श्रद्धा हो पक्की, बिल्कुल हिल न सके, ऐसी श्रद्धा जिसे कोई डिगा न सके। एक बार मैंने अपने मार्ग को जान लिया, स्वीकार कर लिया। अब मेरे मन में किंचित् भी संदेह की कोई गुंजायश नहीं है। यही मार्ग है, तत्त्व के प्रति, देव के प्रति और धर्म के प्रति। अब कोई कुछ भी कहे, सूरज पूरब की जगह पश्चिम से उदित हो लेकिन मेरी धारणा कभी नहीं बदल सकती। उदाहरण दिया है कि जैसे तलवार के ऊपर पानी चढ़ाया जाता है। वह तलवार तो टूट सकती है, लेकिन पानी नहीं छूटता है। इसी प्रकार प्राण निकल जाये, लेकिन भीतर की श्रद्धा अविचलित रहती है। इस श्रद्धा का ही नाम है निःशंकित । यहाँ से धर्म की शुरूआत होती है। श्रद्धा जब तक हमारे हृदय में विकसित नहीं होती है, तब तक धर्म की सच्चे अर्थों में शुरूआत भी नहीं होती । बन्धुओ, निःशंक होना सम्यक्त्व का प्रथम अंग है। तथा श्रद्धा ही सम्यक्त्व का मूल स्वरूप है। जहाँ श्रद्धान है वहीं सम्यक्त्व है। उस श्रद्धान में जिनके प्रति श्रद्धा है, ऐसे श्रद्धेय के प्रति रंचमात्र भी संदेह का भाव नहीं होना ही निःशंकित अंग है। यही मेरा मार्ग है। इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है। श्रद्धा ऐसी ही होनी चाहिये। एक अंधा व्यक्ति भगवान् के दर्शन के लिये जा रहा था। मंदिर की ओर बढ़ रहा था। तभी किसी युवक ने उससे पूछा -कहाँ जा रहे हो ? वह बोला - मन्दिर जा रहा हूँ। क्यों जा रहे हो ? भगवान के दर्शन करने के लिये जा रहा हूँ। अरे तुम्हें दिखता तो है नहीं, मन्दिर जाकर क्या करोगे ? उसने कहा- अरे भैया ! मुझे नहीं दिखता तो क्या हुआ, भगवान को तो दिखता है। वे ही मुझे देख लेंगे तो मैं निहाल हो जाऊँगा । यह है श्रद्धा की अभिव्यक्ति । बन्धुओ, श्रद्धा आन्तरिक होती है। कहते हैं कि श्रद्धा एक प्रकार का भावनात्मक वेग है। इसी वेग के बहाव से हम अपने भीतर के अहम् के कल्मष को बहा सकते हैं। आज बुद्धिवाद का बहुत तेजी से विकास हो रहा है। आज हर आदमी बौद्धिकता के स्तर पर विचार करता है। और यह भूल जाता है कि शुष्क बुद्धिवाद मनुष्य को कहीं का भी नहीं रहने देता है।