दिव्य विचार: अपने आप और प्रभु पर विश्वास करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: अपने आप और प्रभु पर विश्वास करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अनुभव करना चाहते हो तो उसका अनुभव करो जिसके बाद किसी अनुभव की आवश्यकता न हो। यदि दर्शन करना चाहते हो तो उसका दर्शन करो जिसके बाद कोई दृश्य शेष न रहे। यदि पाना चाहते हो तो उसे पाओ जिसे पाने के बाद फिर किसी को पाने की चाहत न रहे। वह तुम्हारे भीतर है लेकिन उसकी तरफ तुम्हारी दृष्टि तब पड़ेगी जब संसार के भ्रमपूर्ण विश्वास को तोड़ोगे। जिनका विश्वास पदार्थ पर जमा हुआ है वे कभी परमार्थ के उपासक नहीं हो सकते हैं। हम बात आत्मा के कल्याण की करते हैं, परन्तु आत्मा पर कितना विश्वास है ? चीजों पर विश्वास है. व्यक्तियों पर विश्वास है। अभी तक अपने और अपने प्रभु पर विश्वास कहाँ जम पाया है ? स्वयं पर विश्वास होना और अपने प्रभु पर विश्वास होना यही सम्यग्दर्शन की बुनियाद है। जिस मनुष्य के अन्तर्मन में यह विश्वास जाग जाता है वह सम्यग्दृष्टि हो जाता है। विचार करो कि जब तुमने सुख चाहा है तो इन्हीं चीज़ों में चाहा है। विषय-भोगों और धन-संपत्ति में चाहा है, पद-प्रतिष्ठा में चाहा है। अरे ! मैंने न जाने जीवन में कितने बड़े-बड़े ओहदे प्राप्त कर लिये, लेकिन न ओहदों से मेरे मन की इच्छायें कभी भी पूरी नहीं हुई हैं। कई-कई बार ऐसा हो गया पर तब भी आदमी को चैन नहीं पड़ती है। एक बार ऐसा हुआ कि एक युवक की शादी तय हुई तो उसने अपने मित्र को पत्र लिखा और कहा कि अमुख तारीख को अमुक स्थान पर मेरी शादी है। आपको आना है। मित्र ने पत्र पढ़ा, कुछ व्यस्तता थी तो उसने पत्र में रखकर एक हजार रुपया भेज दिया और कहा कि मेरी तरफ से यह भेंट स्वीकार कर लो। छह महिने बीते तो फिर से उस युवक का कार्ड आ गया कि मेरी शादी है आपको आना है। उसने पूछा- भाई क्या बात है ? मित्र ने कहा- पहली शादी मैंने रिजेक्ट कर दी है। उसने पूछा क्यों ? वह बोला - हाँ, छह महिने में तलाक दिया है। यद्यपि देखने में तो बड़ी मनपसंद थी, पर बड़ी हुकुम चलाने वाली थी। मैंने सोचा था घर पर आयेगी, खाना-पीना बनायेगी, गृहकार्य में सहयोग करेगी सो वह तो करना दूर की बात और रात-दिन हुकुम चलाये।