दिव्य विचार: मोबाईल सुविधा नहीं, दुविधा बना- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: मोबाईल सुविधा नहीं, दुविधा बना- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जबसे मोबाईल आपकी जेब में आया है लगता है बड़ी सुविधा हो गयी। लेकिन वह ठीक से खाने भी नहीं देता। परिवार में पत्नी से, बच्चों से बात भी नहीं करने देता। रात में सोने भी नहीं देता। सुविधा सुविधा है पर वह कब दुविधा बन जाए कहा नहीं जा सकता ! बाहर से जो कुछ भी जोड़ा जाता है वह बाहर की चीज़ है। पर सुख तो हमारी मानसिकता पर निर्भर करता है। मानसिकता हमारी अध्यात्ममूलक दृष्टि पर निर्भर करती है। यदि हमारी दृष्टि आध्यात्मिक है तो हमारी मनोवृत्ति बदलेगी और मनोवृत्ति यदि बदल जाती है तो हमसे ज़्यादा संसार में सुखी कोई हो ही नहीं सकता है। पैसे की एक सीमा है। आदमी चाहे जितना सोना-चाँदी जोड़ ले लेकिन यह तय मानकर चलना कि वह सोने-चाँदी की रोटियाँ नहीं खा सकेगा। रोटियाँ तो अनाज की ही खाई जाती हैं। पेट सोने चाँदी से नहीं भर सकता है। पेट तो केवल अनाज से ही भरेगा। सोना-चाँदी तो केवल पेटियों में भरने के लिए होता है और पेटियाँ कितनी भी भर लो उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। पेट का तो एक पैमाना है, पर पेटियों की कोई पैमाइश नहीं है। आज सारे लोग उसी के चक्कर में लगे हुये हैं, इसलिये उनके जीवन में अतृप्ति है, पीड़ा है। पैसे की एक सीमा है। पैसा हमें क्या दे सकता है और क्या नहीं दे सकता, यह हमें सोचना है ? पैसे के बल पर रोटी तो खरीदी जा सकती है पर भूख नहीं। पैसे से औषधि खरीदी जा सकती है पर आरोग्य नहीं। पैसे से बिस्तर खरीदा जा सकता है पर आराम नहीं। पैसे से चश्मा खरीदा जा सकता है पर दृष्टि नहीं। पैसे से सुविधा जुटाई जा सकती है पर सुख नहीं। यहीं पैसे की सीमा है। इस बात को अपनी श्रद्धा में जमा लो। फिर पागलपन नहीं होगा । सन्त कहते हैं कि पैसा कमाना है तो कमाओ पर पैसे के पीछे पागल मत होओ। ठीक है कि जंजाल में फॅसे हो तो जितना आवश्यक है उतना कर लो पर याद रखो कि मूल तो भीतर है। फिर पैसे के बाद दूसरे नम्बर पर आता है पदार्थ और पदार्थजन्य भोग । चारों तरफ विषय-भोगों की जो सामग्री है उनसे मुझे सुख मिलता है।