दिव्य विचार: पैसा सुविधा दे सकता है, सुख नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: पैसा सुविधा दे सकता है, सुख नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि यह विश्वास अपने अन्दर प्रगाढ़ रूप से जमा लीजिये कि ये चीजें हमें सुख नहीं दे सकेंगी। महाराज, पैसे के बिना भी तो काम नहीं चलता है ? हाँ, पैसा काम देता है संसार को चलाने में। सुविधा मिल सकती है, पर सुख नहीं । सुविधा अलग चीज़ है और सुख अलग। सुविधायें जुटाई जाती हैं, पर सुख पैदा किया जाता है। सुविधा बाहर के साधनों पर अवलम्बित होती है पर सुख भीतर से प्रकट होता है। सुख भीतर की साधना पर निर्भर करता है। एक धनी आदमी के पास बहुत सुविधा है। उसके पास खाने-पीने के खूब साधन हैं, घूमने-फिरने के लिये गाड़ियाँ हैं। बंगला है, प्रतिष्ठा है, नौकर-चाकर हैं, सब कुछ है। पर यह कोई जरूरी नहीं कि जिस मनुष्य के पास जितनी अधिक सुविधा है वह उतना ही सुखी होगा। बल्कि मैं तो यह देखता हूँ कि ज़्यादा सुविधा सम्पन्न लोग ज़्यादा दुःखी होते हैं। मैं ऐसे अनेक लोगों को जानता हूँ जो बड़े-बड़े सेठ-साहूकार हैं, नौकर- चाकर रखते हैं, लेकिन बिस्तर पर करवटें बदलने को मजबूर हैं, क्योंकि ब्लडप्रेशर की शिकायत है। हार्ट की प्रोब्लम है, साथ में डायबिटीज है। क्या करें ? भाई साहब को अब कोई अनुकूलता ही नहीं है। डॉक्टर ने सब कुछ खाना छुड़वा दिया है। कुछ खा भी नहीं सकते, और यदि खा सकते हैं तो केवल मूंग की दाल और रूखे फुल्के। इसके अलावा कुछ नहीं खा सकते। अब मात्र गम खा सकते हैं। सुविधायें सब तरफ हैं, पर सुख नहीं। नौकर-चाकर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। कुत्ते कार में घूम रहे हैं और सेठ जी बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं। बहुत सुखी हैं ? हैं न ? यह प्रतिमान है। इस पर विचार करो और इस धारणा को पक्की बनाओ कि ये सुविधायें ऊपर की चीजें हैं और कई-कई बार तो जिसे हम अपने जीवन की सुविधा मानते हैं वह दुविधा बन जाती है।