दिव्य विचार: सुख की चाहत वस्तुत : सुख का भ्रम है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि वस्तुतः जिनसे हमने सुख की चाहत पाल रखी है उनमें सुख है ही नहीं। केवल सुख का एक भ्रम है और यह भ्रममूलक स्थिति जब तक बनी रहेगी तब तक हम जीवन के रूपान्तरण को घटित नहीं कर सकते हैं। हमारे भीतर जब सही समझ विकसित होती है, सच्ची श्रद्धा विकसित होती है तो सबसे पहले इस भ्रम का निवारण होता है। बन्धुओ, दो चीजें हैं एक भ्रम और एक विश्वास। जहाँ भ्रम है वहाँ विश्वास नहीं है और जहाँ विश्वास है वहाँ पर भ्रम नहीं है। अभी तक हम भ्रान्ति मूलक जीवन जीने के अभ्यासी बने रहे हैं। हमें अभी तक संसार और संसार में सुखोत्पादक चीजों के प्रति भ्रमपूर्ण विश्वास बना हुआ है। यह लगा कि जितना धन-पैसा कमायेंगे हमारा जीवन उतना ही सुखी होगा। जितने विषय-भोगों के साधन अपनायेंगे, हमारे जीवन में उतना ही सुख होगा। जितनी अधिक पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे उतना अधिक हमें जीवन का सुख मिलेगा। पर थोड़ा विचार करके देखो कि हमने आज तक जीवन में यह सब किया तो क्या सुख मिला ? हमने कितनी अधिक धन-सम्पत्ति नहीं जोड़ी ? जीवन भर धन-पैसा जोड़ लेने वाले को भी अन्त तक चैन कहाँ मिलता है ? बिल गेट्स आज पैसा कमाकर दुनिया के सबसे अमीर की श्रेणी में तो आ सकता है, पर दुनिया के सबसे सुखी आदमियों में अभी उसका स्थान नहीं है। क्यों नहीं ? वह गर्व के साथ कहता है कि मैं दुनिया का सबसे धनी आदमी हूँ, पर कभी उसके मुख से यह सुनने को मिला कि मैं दुनिया का सबसे सुखी आदमी हूँ ? ध्यान रखना, दुनिया के जितने भी धनी आदमी हैं, वे सुखी लोगों की श्रेणी में अपना स्थान नहीं बना पाते हैं। उनको यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है। क्योंकि धन-पैसा और सुख ये दोनों परस्पर विरोधी हैं। जहाँ सम्पत्ति होगी, वहीं आकुलता होगी, व्यग्रता होगी, चिन्ता और संताप होगा और जहाँ ये सब चीजें होगीं वहाँ जीवन में कभी भी सुख आ ही नहीं सकता। उसे दुनिया का सबसे बड़ा धनपति बनने का श्रेय भले ही मिल गया पर वह दुनिया का सबसे सुखी आदमी नहीं है।






