दिव्य विचार: सुख बाहर नहीं, आपके भीतर हैं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: सुख बाहर नहीं, आपके भीतर हैं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि यह बात सही है कि तुम्हारे चारों ओर पदार्थ घिरे हुए हैं, पर पदार्थों से सुख का निचोड़ नहीं निकल सकता है। तुम अपने जीवन में सुख, शान्ति और प्रसन्नता चाहते हो तो इस बाहर के जगत् से तुम्हें अन्तर्जगत् की ओर आना पड़ेगा। बाहरी जगत् में विमुग्ध व्यक्ति की प्रवृत्ति बहिर्मुखी बनी रहती है और जब तक बहिर्मुखता है तब तक दुःख है। इस बहिर्मुखी प्रवृत्ति को नियन्त्रित कर जब हम अन्तर्मुखी चेतना का विकास करते हैं तब हमारे भीतर एक आध्यात्मिक क्रान्ति घटित होती है और यही आध्यात्मिक क्रान्ति आत्मोद्धार का मार्ग प्रशस्त करती है। वह दृष्टि हमारे भीतर घटित होनी चाहिये । अभी हम केवल बाहर-बाहर देख रहे हैं। हमें सुख मिलता है केवल बाहर की चीज़ों में। हम सम्पत्ति में सुख खोजने की कोशिश करते हैं, हम संसार की और चीज़ों में सुख खोजने की कोशिश करते हैं। पर बन्धुओ, न शरीर में सुख है, न सम्पत्ति में सुख है और न सामग्री में सुख है। सुख तो भीतर है लेकिन उसका आभास केवल उन्हें होता है जो भीतर झाँक कर देखने की कोशिश करते हैं। जब तक हमारा जीवन संसार की चीज़ों में भ्रान्त बना रहता है, हमारा विश्वास भ्रमपूर्ण बना रहता है और भ्रम पूर्ण विश्वास के साथ यथार्थ की उपलब्धि नहीं की जा सकती है। भ्रम में केवल भटकाव है। हमने सुना है कि मृग चमकती हुई रेत को जल का भ्रम पालकर भटकता है। उसे लगता है कि आगे सरोवर लहलहा रहा है। मैं थोड़ा चलूँगा तो आगे जाकर मुझे असीम सरोवर का लाभ मिलेगा। वहाँ जाकर मैं अपनी प्यास बुझा लूँगा, लेकिन मृग कभी भी अपनी प्यास बुझा नहीं पाता है। वह केवल भटकता ही रहता है, भटकता ही रहता है और उसे जीवन में केवल भटकन, अतृप्ति, प्यास, आतुरता और पीड़ा के अलावा कुछ भी नहीं मिलता। वह अपने प्राण यूँ ही गॅवा देता है। बात तो सच है कि जहाँ जल है ही नहीं वहाँ जल का भ्रम पालने से प्यास बुझेगी कैसे ? जहाँ जल है ही नहीं, वहाँ तो केवल रिफ्लेक्शन है, चमकती हुई रेत पानी की तरह दिखती है, पर पानी है नहीं।