दिव्य विचार: किसी का भी हक मत छीनो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अगर अपने जीवन का उद्धार करना चाहते हो तो पहले खुद छोड़ो, फिर छुड़ाने की बात करो। यह छुड़ाने की बात है। तुम लोग क्या करते हो, पिण्ड छुड़ाते हो। बुराई छुड़ाओ, परिग्रह छुड़ाओ, पाप छुड़ाओ, पाखण्ड छुड़ाओ और तुम लोग तो पिण्ड छुड़ाने की कोशिश करते हो। भैया ! किससे पिण्ड छुड़ा रहे हो? जिससे तुम्हारा अहित हो, उससे पिण्ड छुड़ा दो, ठीक है लेकिन जिससे तुम्हारा हित हो, उससे अपनी प्रीति बनाने में कमी मत करो, तब जीवन का कोई लाभ होगा और अपने जीवन में कोई सार्थक उपलब्धि घटित की जा सकेगी। लोगो की बुराई छुड़ाना, नाता मत छुड़ाना, रिश्ता मत छुड़ाना, व्यवहार मत छुड़ाना, प्रेम मत छुड़ाना। लोग ये सब छुड़ाने में माहिर हैं। जो है, वह नहीं छूते यह विडम्बना है। बात-मानना मतलब किसी के स्वामित्व की चीज को बलपूर्वक हड़प लेना। बलपूर्वक ले लेना, यह घोर अनैतिक कर्म है। छीना-झपटी तो एक प्रकार का पाप है, यह लूट-खसोट है। तुम लोग छीनते हो। तय करो कि आज से मैं अपने जीवन में कभी किसी से कुछ नहीं छीनूँगा और छीनूँगा भी तो मौका छीनूँगा। किसका? अच्छा काम करने का मौका छीन लूँगा और कुछ नहीं छीनूँगा। तुम लोग धन छीनते हो, तुम लोग सम्पत्ति छीनते हो। यह तो लूट-खसोट का काम है, लुटेरों का काम है, डकैतों का काम है। यह छीना-झपटी क्यों? इस छीना-झपटी से अपने आपको बाहर करो, छीनना है तो मौका छीनो, अच्छे कार्यों का मौका छीनो। जिससे तुम अपने जीवन को सुन्दर बना सको, जीवन को ऊँचाइयों तक पहुँचाने में समर्थ बन सको। लेकिन लोग हैं, आजकल तो बड़ी ज्यादा छीना-झपटी लगी है, होड़ है, गलाकाट प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। यह प्रवृत्ति बहुत ही भयानक प्रवृत्ति है, हमें ऐसी प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना चाहिए। आज लोग इस तरह के कृत्य से इस तरह जुड़ गए हैं कि लोगों के जीवन में कोई जमीर नहीं बचा कोई ईमान नहीं बचा। लोग किसी भी स्तर तक उतर जाते हैं।






