दिव्य विचार: बुरी आदतें ही व्यसन हैं, इन्हें छोड़ें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि धरती पर अगर चन्दन का पेड़ उगाना हो तो वर्षों लग जाते हैं और बेशरम का पौधा उगाने में कुछ श्री श्रम नहीं लगता। उसे तो जहाँ फेंक हो, अपने आप उग आता है, इसलिए उसका नाम ही बेशरम है। अच्छाईयों को आरोपित करना होता है, बुराईयाँ स्वतः प्रकट हो जाती हैं। न केवल प्रकट होती है अपितु बहुत तेजी से पनपने भी लगती हैं। एक बार मनुष्य किसी बुराई से जकड़ जाए तो उससे होना उसके लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है। वह उसके चित्त और चेतना को खोखला कर देती है। कहते हैं- जिस धरा पर बेशरम या गाजर घास उग जाती है, वहाँ उसके रहते कोई अच्छी फसल नहीं उग पाती। चित्त की भूमि में यदि हम अच्छे बीजों का अंकुरण करना चाहते हैं तो हमें सबसे पहली आवश्यकता उसे साफ करने की है, जो बुराईयों की गाजर घास हमारे चित्त की भूमि में उग आई है, जो बेशरम उग आई है, आवश्यकता उसे उखाड़कर अपनी मनोभूमि को स्वच्छ बनाने की है। आज बात मैं उसी की कर रहा हूँ- 'व' पर मुझे जो बात करनी थी, वह बात आज मैं कर रहा हूँ। वह है- व्यसन, जो हमारे जीवन की सबसे बड़ी बुराई है। जो हमारा पतन कराए, वह व्यसन है। व्यसन का मतलब? किसको बोलते हैं व्यसन ? बुरी आदत । व्यसन का मतलब होता है दुःख। संस्कृत में व्यसन का अर्थ दुःख होता है। हमारे अन्दर की जो भी बुरी आदतें हैं, वे सब व्यसन ही हैं। व्यसन है क्या? जिसे हम करना भी न चाहें और छोड़ भी न पाएँ, उसका नाम व्यसन है। किसी भी व्यसनी की बात करिए आप, व्यसन यानी लत । लत अच्छी भी होती है, बुरी भी होती है। अच्छी लत लगन में बदल जाती है, जो हमारे जीवन को ऊँचा उठा देती है लेकिन बुरी लत हमारा पतन करा देती है, वह हमें बहुत नीचे ले जाती है। कई कार्य ऐसे होते हैं, जिन्हें हम करना नहीं चाहते लेकिन करते हैं, वे व्यसन हैं, छोड़ नहीं पाते, वे व्यसन हैं। व्यसन, हम जब भी व्यसनों की बात करते हैं, हमारा ध्यान सप्त व्यसनों पर चला जाता है।






