दिव्य विचार: धन का साम्राज्य आ जाए तो तृप्ति नहीं होती - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: धन का साम्राज्य आ जाए तो तृप्ति नहीं होती - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि तुम्हारे साथ भी ऐसा एक बार नहीं, अनन्त बार हो चुका है। अनन्त जीवन और अनन्त जन्म तुमने इसमें बिता दिये। केवल इसी को एकत्रित करने की होड़ में लगे रहे लेकिन तुम्हारी प्यास आज तक अबुझ है। जैसे अनन्त सरिताओं के प्राप्त हो जाने के बाद भी कभी समुन्दर की प्यास नहीं मिटती। ऐसे ही मनुष्य के पास धन का विपुल साम्राज्य भी आ जाये तो भी उसे तृप्ति नहीं मिलती है। जैसे श्मसान में सैकड़ों चितायें जलने के बाद भी श्मसान अतृप्त रहता है, वैसे ही तृषातुर मनुष्य का चित्त अपार धनराशि पा लेने के बाद भी अतृप्त बना रहता है। वहाँ तृप्ति नहीं है। यह मेरा भ्रमपूर्ण विश्वास ही है कि मैं ऐसा कर लूँगा तो सुखी हो जाऊँगा। हम सुखी होना चाहते हैं, हर व्यक्ति का लक्ष्य सुखी होने का है पर उसे यह नहीं मालूम कि आखिर सुख है कहाँ ? सुख बसता कहाँ है ? सुख पाया कैसे जाता है ? जिस चीज़ के मूल में भ्रम है, जो भ्रमपूर्ण विश्वास है वह कभी यथार्थ तक हमें पहुँचा नहीं सकता है इसलिये इस बात की हमें ठीक ढंग से समीक्षा करके देखने की ज़रूरत है कि आखिर मेरी मान्यता सही है या गलत है ? मैं सुखी होना तो चाहता हूँ पर किसमें ? जिस मार्ग को मैंने अपनाया है वह मुझे सुखी बनाने में कितना कार्यकारी है। बीमार आदमी इलाज कराये। अभी कहा गया कि बड़े डॉक्टर के पास जाकर इलाज करायें। पर यह भी देखें कि जिससे हम इलाज करा रहे हैं उससे हमें लाभ मिल रहा है कि नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम जो उपचार करा रहें हैं वही हमारी बीमारी को बढ़ा रहा हो। ध्यान रखना, कि शरीर की बीमारी के प्रति तो आप रात-दिन सावधान रहते हैं, और यदि दवाई काम नहीं करती है तो आप तुरन्त दवाई बदलते हैं और दवाई बदलने से काम नहीं चलता है तो आप कहते हैं- भैया अब अस्पताल ही बदल दो, यहाँ काम नहीं चलेगा। अथवा बम्बे, दिल्ली चलो और बॉम्बे, दिल्ली में भी काम नहीं चलता है और यदि आपके पास संसाधन हैं तो अमेरिका चलो, वहाँ किसी बड़े डॉक्टर को दिखायेंगे। वहाँ भी काम नहीं चलता है तो आप कहते हैं - पैथी बदलो, ऐलोपैथी में बहुत ज्यादा रिएक्शन होता है, आयुर्वेद अच्छा है।