दिव्य विचार: संसार की चीजों से अपना भ्रम तोड़िए- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: संसार की चीजों से अपना भ्रम तोड़िए- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बन्धुओ, जब तक हमारा विश्वास नहीं बदलता है तब तक हमारे जीवन में रूपान्तरण नहीं हो सकता है, इसलिये अपने अन्दर यह दृढ़ विश्वास बनाईये। संसार की चीज़ों से अपना भ्रम तोड़िये। भ्रान्तियों में जो मैंने सुख माना है वास्तव में इनमें सुख है ही नहीं। सुख मेरे भीतर है, बाहर नहीं। सुख मुझे जब भी मिलेगा, मुझसे ही मिलेगा। बाहर की चीज़ों से यदि मुझे सुख मिलता है तो वह मेरी मानसिकता की अनुकूलता रहने तक ही मिलता है। जब तक मेरी मानसिकता अनुकूल है बाहर की चीजें मुझे अनुकूल लगती हैं। पत्नी यदि अनुकूल है तो प्रिय लगती है, लेकिन कब तक ? जब तक पत्नी के प्रति कोई संदेह नहीं तब तक। जिस दिन कहीं से भ्रम हो जाये या पत्नी किसी से फोन पर बात कर रही हो। संयोग से अपने भाई से ही बात कर रही हो और पतिदेव उनकी वार्ता को आधी अधूरी सुनें और मन में कोई शंका हो जाय तो अब तक प्राणप्रिय लगने वाली पत्नी भी कुल्टा दिखने लगेगी। यदि किसी के प्रति संदेह हो जाये या धारणा पलट जाये तो जिसे हम अच्छा मानते हैं, उसे ही हम बुरा मानना शुरू कर देते हैं। एक बार ऐसा हुआ, पति सफाई में लगा हुआ था। सफाई करते-करते पति के हाथ में एक पुस्तक लगी। वह पुस्तक तीस वर्ष पहले जब उनकी शादी हुई थी तो पत्नी अपने मायके से लेकर आई थी। उसने पुस्तक को पल्टा तो उसमें एक पत्र मिला। तीस वर्ष पहले पत्नी ने अपने पुराने प्रेमी को जो पत्र लिखा था यह वही पत्र था। पत्र पढ़ते ही पति को एकदम गुस्सा आ गया। यह बात है, असलियत यह है। मैं तो अभी तक भ्रम में था। मैं तो कुछ और ही समझता था। मामला अब साफ हो गया, अब देखता हूँ। अब क्या हो गया ? पत्नी वही है, पत्नी का व्यवहार वही है, लेकिन अब पत्नी में वह रस नहीं, जो कुछ देर पहले तक था। अब वह पत्नी नम्बर एक की दुश्मन हो गई। फूटी आँख सुहा नहीं रही है, क्योंकि पत्नी का प्रेम मुझसे नहीं किसी और से है। हालांकि है कुछ नहीं यह केवल एक भ्रम है। मैं आपसे कहना चाह रहा था कि संसार की चीजें हमें सुखी तभी तक करती है, जब तक हमारी मानसिकता अनुकूल होती है।