दिव्य विचार: आहार-विहार में जिंदगी काट दी पर मिला क्या?- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: आहार-विहार में जिंदगी काट दी पर मिला क्या?- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि विचार करो, तमाम ज़िन्दगी तो व्यतीत हो गई पर आखिर तुम्हें इससे सुख मिला ? हर व्यक्ति एक ही तो काम कर रहा है, केवल आहार, निद्रा, मैथुन और भय के चक्कर में लगा हुआ है। जन्म से लेकर अभी तक हमने केवल विषयों का उपभोग किया पर मिला क्या ? हम सोचते हैं कि अभी नहीं तो अगली बार करेंगे तब शान्ति मिलेगी। अभी यह चीज़ नहीं पाई, यदि यह पा लेगें तो शान्ति मिलेगी। हम हर बार वही कार्य करते जाते हैं, पर हर बार का अनुभव बताता है कि इससे कोई शान्ति नहीं मिलती है, लेकिन फिर भी मन में एक आशा जगती है कि चलो एक बार और कर लो। नतीजा यह निकलता है कि अनुभव हार जाता है आशा जीत जाती है और यही आशा हमें संसार की चकाचौंध में लगा देती है लेकिन मिलता कुछ भी नहीं है। एक दिन गुरु जी ने छात्रों को कुत्ता पर लेख लिखकर लाने को कहा। सभी छात्र कुत्ते पर लेख लिखकर ले गये। एक छात्र का लेख पढ़कर गुरु जी को बड़ा अचम्भा हुआ। गुरु जी ने कहा कि लेख तो तुमने बहुत सुन्दर लिखा है, लेकिन ठीक एक वर्ष पहले ऐसा ही लेख तुम्हारा बड़ा भाई लिखकर लाया था। उसमें और इसमें एक मात्रा का भी अन्तर नहीं है। मामला क्या है ? उस बच्चे ने कहा- गुरुजी, कुत्ता भी तो वही है। तब लेख दूसरा कहाँ से आयेगा ? बन्धुओ, हकीकत यही है कि अब तक तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी हुआ है सब ही पुनरावृत्ति है । आहार, निद्रा, भय और मैथुन रूपी कुत्ते पर लेख लिखते आये हो, पर मिला कुछ भी नहीं है। क्या नहीं किया अनन्त भव में ? तुम्हारे द्वारा काम, भोग और बन्ध की कथायें जनम-जनम से सुनी गई हैं। जनम जनम में परिचय में आयी हैं, जनम जनम में तुमने उनका उपभोग किया है। अगर करना ही चाहते हो तो उसको करो जो आज तक तुम्हारे लिए अपरिचित रहा है। परिचय पाना चाहते हो तो उसका परिचय पाओ जिसके पाने के बाद किसी के परिचय की कोई ज़रूरत न हो ।