दिव्य विचार: हमेशा प्रसन्न रहने की कला सीखिए- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: हमेशा प्रसन्न रहने की कला सीखिए- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि चिन्तन की धारा को मोड़िये और हमेशा प्रसन्न रहने की कला को सीख लीजिये। सम्यग्दर्शन का मतलब उस सत्यदृष्टि को जागृत करना है जो हमें हर स्थिति में प्रसन्न बनाये रखने की कला सिखाती है। जो संसार के विषयों की कीच में भी कमल की तरह निर्लिप्त रहने की कला सिखाये, पाप में रहने के बाद भी पाप से अलिप्त रहने की कला सिखाये, उसी का नाम है सम्यग्दर्शन। वह दृष्टि हमारे अन्दर भी विकसित होनी चाहिये । मैं रूपमय नहीं हूँ, स्वरूपमय हूँ, उसको देखें। मेरा स्वरूप कुछ भिन्न है, इसको पहचानो। हमारी दृष्टि बाहरी रूप पर रही है, जब वह स्वरूप पर केन्द्रित होती है तभी जीवन की दिशा और दशा बदलती है। दृष्टि बदलेगी तो सृष्टि अपने आप परिवर्तित हो जायेगी। यह विश्वास जब तक हमारा नहीं बदलेगा तब तक हमारा जीवन निहाल नहीं हो सकेगा। हमने शरीर की उत्पत्ति को अपनी उत्पत्ति और शरीर के विनाश को अपना विनाश मान रखा है। शरीर और जगत से परे हमारी दृष्टि ही नहीं रही। हमने शरीर जगत को ही अपना सर्वस्व माना है। पर बन्धुओ, शरीर में हम हैं जरूर, पर हम शरीर नहीं हैं, यह विश्वस जगाइये। मैं रूपवान दिखता जरूर हूँ पर मेरा स्वरूप अरूपी है। यह विश्वास हमें अपने अन्दर जाग्रत करना होगा। यह हमारा अपना विश्वास है। इस तरफ जब हमारी दृष्टि जागेगी तो निश्चित रूप से हम अपने जीवन में कामयाबी हासिल कर लेंगें। ऐसी सत्यशोधक दृष्टि जब मनुष्य के अन्दर विकसित हो जाती है तभी वह सम्यग्दृष्टि होता है। जो शरीर और आत्मा के भेद को जान लेता है, जो सार और असार को जान लेता है, जो हेय और उपादेय को जान लेता है, जिसके प्रकट हो जाने के बाद कर्तव्य और अकर्तव्य का भान हो जाता है, वह दृष्टि हमारे अन्दर विकसित हो और ऐसी दृष्टि जब मनुष्य के अन्दर विकसित हो जाती है उसके जीवन का रंग और ढंग परिवर्तित हो जाता है। सम्यग्दर्शन उत्पन्न होते ही मनुष्य के अन्दर कुछ खास गुण विकसित होने लगते हैं और वे गुण मनुष्य के आध्यात्मिक मार्ग को प्रशस्त करते हैं।