दिव्य विचार: आत्मा के कल्याण का प्रयास करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि वैराग्य किससे ? संसार से, शरीर से और भोगों से। इनकी असारता को जब तक नहीं समझोगे तब तक तुम्हारा मन उनसे उचटेगा नहीं। विषयों से मन के उचटने का नाम ही वैराग्य है। उनकी आसक्ति से छूटने का नाम ही वैराग्य है। और यह तब होगा जब तुम उसकी वास्तविकता को समझने की कोशिश करोगे, अभी शरीर से बड़ा गाढ़ा राग है, जब वैराग्य होगा उसी क्षण तुम्हारे भीतर एक तपस्वी का जन्म हो जायेगा, तुम्हारे भीतर एक साधक का आविर्भाव हो जायेगा। संत कहते हैं - तुम साधना करना चाहते हो, शरीर की दृष्टि से ऊपर उठो, आत्मदृष्टा बनो। संत तुलसीदास जी का जीवन हम सबके लिए बड़ा प्रासंगिक है। कहते हैं तुलसीदास जी अपनी पत्नी रत्नावली पर बड़े आसक्त थे। अचानक उन्हें अपने पीहर जाना पड़ा । तुलसीदास जी को अपनी पत्नी का विछोह सहन नहीं हुआ तो वे अंधेरे में बगैर सूचना के अपनी पत्नी से मिलने के लिये चले गये। कहानी आप सबको पता है । रात के अंधेरे में निकले। नदी में बाढ थी। एक मुर्दे की ठठरी को तख्ता समझकर पार उतर गये। लटकते हुए साँप को रस्सी मानकर उसके सहारे चढ़ गये। प्रिया से मिलन की जो चाह थी। वस्तुतः यह शरीर का अनुराग था, जो उन्हें वहाँ खींचकर ले गया। जब फटकार लगी तुलसीदास जो 'अस्थि चर्ममय देह यह ता संग ऐसी प्रीत। यदि होती रघुनाथ से तो मिटती भवभीत ॥' तुम मेरे हाड़- माँस के शरीर के प्रति प्रीति रखकर तमाम बातों को दरकिनार करके दौड़े चले आये। यदि श्रीराम से ऐसी प्रीति रखते तो संसार में इतना भटकना नहीं पड़ता। इस एक वाक्य ने तुलसीदास को स्वामी तुलसीदास बना दिया। जो काम में आसक्त थे वे राम में अनुरक्त हो गये। वस्तुतः जब तक हम शरीर की अशुचिता को नहीं पहचान लेते, तब तक आत्मा में अनुरक्ति कभी हो नहीं सकती। संत कहते हैं कि शरीर की अपवित्रता को जानो और इसके माध्यम से आत्मा के कल्याण का प्रयास करो। हमारे शरीर के साथ एक बड़ी विशेषता है, कि शरीर अपवित्र भले ही है, पर वह आत्मा के कल्याण का आधार भी है।






