दिव्य विचार: जीवन चंदन का रूप है सुवासित करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: जीवन चंदन का रूप है सुवासित करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि यह जीवन हमें चन्दन के रूप में मिला है, अपने जीवन को सुवासित करने में इसका उपयोग करो। किसी चर्मकार के हाथ में चन्दन की लकड़ी लग गई, उस चन्दन की लकड़ी से चमड़ा कूटने लग जाय तो हम क्या कहेंगे ? चन्दन की लकड़ी तुम्हारे हाथ में है, वह कूटने के लिए नहीं। उस चन्दन की लकड़ी का उपयोग करो तो तुम बहुत अच्छा काम कर सकते हो । उसकी धूप बनाओ, सर्वत्र सुवास फैल सकती है। चन्दन को घिस कर माथे पर लगाओ, तुम्हारा संताप दूर हो सकता है। चन्दन को घिसकर यदि चाहो तो प्रभु की पूजा में भी लगा सकते हो। लेकिन इतना विवेक हो तब तो। चन्दन चन्दन है, लेकिन यदि उससे चमड़ा कूट रहे हो, तो यह तुम्हारा दुर्भाग्य है। मैं ऐसा मानता हूँ कि जो केवल अपने शरीर के सम्पोषण में लगे हैं, वे देह में ही आसक्त हैं उन्हें और कुछ नहीं सूझ रहा। जितनी सेवा उतना दाम बन्धुओ ! चर्म की सेवा तो तुमने खूब की, मर्म को भी पहचानने का प्रयास करें, मर्म को जानें। मानता हूँ कि शरीर जीवन के लिए बड़ा उपयोगी है, इसका सदुपयोग कीजिये। जितना समय हम अपने शरीर के संरक्षण में लगाते हैं, उतना उससे काम भी लेते हैं कि नहीं। आप अपने यहाँ नौकर रखते हो, जितना वेतन देते हो उतना काम लेते हो या नहीं, बताओ। काम कम लेने के बजाय ज्यादा काम लेते होगे। इसी तरह तन भी तुम्हारे चेतन का नौकर है, उसे जितनी खुराक दे रहे हो, उतना काम ले पा रहे हो या नहीं ? यह देखो। रात दिन इसी में लगे हो, किसके लिये मिला है यह शरीर ? यह मनुष्य जन्म किसलिये मिला ? इसलिये कि तुम रमणीय स्त्रियों में रमण करते रहो, इसलिये कि अपने पुत्र- मित्रों के मोह में उलझे रहो, इसलिये कि धन- सम्पदा के संग्रह में पागल बने रहो, नहीं केवल आत्मोद्धार के लिए भवसागर से पार उतरने के लिये तुमने यह मनुष्य भव पाया है। यदि मनुष्य भव पाकर भी तुम यह नहीं समझ पाते हो तो तुम्हारा दुर्लभमनुष्य जन्म व्यर्थ में जायेगा । इसलिये अपनी दृष्टि को मोड़िये, एक-एक इन्द्रिय की आसक्ति को छोड़िये । तब कुछ किया जा सकता है।