दिव्य विचार: जीवन में परिवर्तन लाने की कोशिश करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बन्धुओं ! हमारी संस्कृति में न नाम पूजा जाता है, न रूप पूजा जाता है, न पैसे को पूजा जाता है, न पद को पूजा जाता है, केवल गुणों को पूजा जाता है। चरित्र को पूजा जाता है। और ये केवल साधना से प्रकट होते हैं। अपने चारित्रिक स्तर को हम कैसे बढ़ा सकते हैं ? इसका हमें विचार करना चाहिए और हमारे चरित्र का स्तर तभी बढ़ेगा जब हमारे जीवन में अध्यात्म की भावना जागेगी। अशुचि भावना हमें यही सिखाती है कि विषयों से विरक्ति और आत्मा से अनुरक्ति का पाठ पढ़ने का अवसर हमें मिला है। हमारा जीवन थोड़ा-सा है, आज ही दृष्टि को मोड़ना शुरु करें। जहाँ हैं, जैसे हैं, जितने हैं, वहीं से अपने जीवन में परिवर्तन लाने की कोशिश करें। लेकिन क्या करें आज के लोगों की हालत बड़ी विचित्र है, वे बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, काम कुछ नहीं करना चाहते। हम चाहते हैं कि सब कुछ मिल जाय, लेकिन कुछ ना करना पड़े। बन्धुओ ! मरे बिना स्वर्ग भी नहीं मिलता। बिना किये कैसे होगा ? तुम साधना चाहते हो जीवन का कल्याण, और अपने रास्ते को बदलना नहीं चाहते, फिर कैसे संभव होगा। एक भाई मेरे पास आये, बोले महाराज - आप लोग त्याग-तपस्या की बात करते हो। हमें समझ में नहीं आता। आप हमें कुछ शार्टकट बता दो, बड़ा कष्ट होता है आप लोगों की तपस्या देखकर। प्यास की वेदना सहना, इतनी त्याग-तपस्या करना, सर्दी-गर्मी की बाधा सहन करना, कोई दूसरा मार्ग बताओ । हम तो अध्यात्म की ऐसी ही साधना करना चाहते हैं। मैने उनसे कहा-भाई साधना करना चाहते हो तो एक बात ध्यान रखना। बर्तन को तपाये बिना दूध को नहीं तपाया जा सकता। साधन बर्तन है, दूध साध्य है। ध्येय बर्तन को तपाने का नहीं, दूध को तपाने का है। लेकिन बर्तन के बगैर दूध न आज तक तपाया जा सका है और न तपाया जा सकेगा। बिना तपाये दूध की सुरक्षा भी नहीं हो सकती। यदि सुरक्षित रखना है तो उसे तपाओ। बस इतना ही ध्यान रखना है कि हमारा ध्येय दूध को तपाना है, बर्तन नहीं।






