दिव्य विचार: संसार तो कुछ दिनो का मेला है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: संसार तो कुछ दिनो का मेला है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अनुभूति होती है, दूसरी में वैमनस्य और उपेक्षा के कारण स्वार्थ टकराते हैं, जिससे एकत्व की अनुभूति होती है। ये दोनों अनुभूतियाँ सच्ची एकत्व की अनुभूति नहीं हैं। यथार्थ अनुभूति तो वह है जो उदासीनता के कारण होती है। जीवन के वास्तविक बोध के कारण होती है। ऐसी एकत्व की अनुभूति में ही परम अध्यात्म का सार निहित होता है और जो इस एकत्व का अनुभव कर लेते हैं उन्हें फिर इस संसार में भटकना नहीं पड़ता है। बन्धुओ ! एकत्व का अनुभव करने का मतलब है, अपनी निगाहें पर से मोड़कर स्व पर केन्द्रित करना। अब तक हमारी दृष्टि 'पर' पर केन्द्रित है, यह एकत्व नहीं है। यहाँ अपेक्षा है, आकांक्षा है, आसक्ति है, परमुखापेक्षिता है, पर-निर्भरता है और जब तक पर-निर्भरता बनी रहेगी, वास्तविक एकत्व की अनुभूति नहीं होगी और जब तक ऐसी एकत्व की अनुभूति नहीं होगी, सच्चे अध्यात्म का आनन्द भी प्रकट नहीं होगा। 'एकत्व की अनुभूति करो'। एकत्व की अनुभूति का मतलब क्या है ? भीड़ में भी अपने आपको अकेला महसूस करना। एकत्व की अनुभूति का अर्थ यह नहीं है कि आप घर-परिवार छोड़कर अपने आपमें डूब जाओ। संन्यास को अंगीकार कर लो, वनवासी हो जाओ। ऐसा हो तो बहुत अच्छा है, पर किसी के कहने से कोई कभी संन्यासी नहीं बनता। संन्यास तो भीतर की घटना है, जो बड़े पुण्य के योग से यदा-कदा किसी में घटती है। एकत्व भावना का मतलब कुल यही है कि तुम संसार में रहो, पर संसार को एक मेले की तरह मान करके चलो। अपने भीतर संसार को विकसित मत होने दो। यह मान कर चलो कि यह तो एक मेला है, एक संयोग है। कहीं मेला लगता है तो विभिन्न दिशाओं से लोग आते हैं। इकट्ठे होते हैं और जैसे ही मेला पूरा होता है तो सब अपनी-अपनी दिशा में चले जाते हैं। परिवार का संचालन करो, समाज में कार्य करो, कर्तव्यबुद्धि से उसे पूरा करो, पर यह मानकर चलो, मैं जन्मा अकेला था और मरूँगा भी अकेला ही। मेरा कोई नहीं है।