दिव्य विचार: एकाकीपन को भरा जा सकता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: एकाकीपन को भरा जा सकता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जीवन में कई बार एकत्व की अनुभूति होती है, कई बार आप अकेलेपन का अहसास करते हैं, लेकिन वह अकेलापन, वह एकत्व आध्यात्मिक एकत्व नहीं रहता। सांसारिक एकत्व होता है। कभी-कभी जब हम अपने प्रियजन के विछोह को देखते हैं तो बड़ा एकाकीपन, खालीपन लगता है। बिटिया की शादी के बाद विदा की तो मन भारी हो जाता है। बीस-बाईस साल तक जिस बेटी को पाल-पोस कर बड़ा किया, आज उसे हमेशा-हमेशा के लिए अपने घर से विदा करना पड़ा, तब लगता है कि संसार में कोई किसी का नहीं है। पत्नी पीहर गयी है, बच्चे घर में नहीं हैं, अकेलापन का अनुभव हो रहा है, ऐसा लगता है कि मेरा जीवन पूरा एकाकी है। पति दफ्तर में हैं, बच्चे स्कूल में हैं, घर में पत्नि अकेली है, लग रहा है कि जीवन एकदम एकाकी है। यहाँ अकेलेपन की अनुभूति तो है, लेकिन यथार्थ नहीं। ऐसा लग रहा है कि जैसे कोई नहीं, लेकिन वापस आ जाएँ तो उस एकाकीपन को भरा जा सकता है। एकाकीपन तभी तक है जब तक कोई आ नहीं जाता। बिछोह है और बिछोह में सामने वाले के बिछोह के कारण कुछ पल की आकुलता होती है। वह आकुलता मनुष्य को एकाकीपन का बोध कराती है, लेकिन जैसे ही समय बीतता है, एकत्व पूरा हो जाता है। वस्तुत-इस एकत्व में पर की अपेक्षा है। कभी-कभी हमें एकत्व की अनुभूति तब होती है, जब हम दूसरे से अपने को उपेक्षित महसूस करते हैं। जब कोई किसी को पूछता नहीं है। किसी से हमारी बड़ी अपेक्षाएँ रहती हैं, और वे पूर्ण नहीं होती। उस समय हम अपने आपको उपेक्षित महसूस करते हैं और तब व्यक्ति के मुख से निकलता है, क्या बताऊँ स्वार्थ का संसार है, सारी दुनिया स्वार्थी है, कोई किसी का नहीं है, सब मतलब के यार हैं।, बेटा यदि पिता की उपेक्षा करता है, पिता के प्रति बेवफा हो जाता है तो पिता को लगने लगता है कि वाकई में आज कोई किसी का नहीं है। भाई-भाई के साथ यदि बेवफाई करता है तो ऐसा लगता है, संसार में कोई किसी का नहीं है।