दिव्य विचार: सुख-दुख तुम्हें अकेले ही भोगना पड़ेगा- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: सुख-दुख तुम्हें अकेले ही भोगना पड़ेगा- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि संयोग को नकारा नहीं जाता और साथ को स्वीकारा नहीं जाता। संयोग है, साथ है ही नहीं। कोई किसी का साथी नहीं। यह तो बाद की बात है कि कोई किसी को साथ नहीं देता। यथार्थ तो यह है कि चाहे भी तो साथ नहीं दे सकता। साथ देता नहीं, यह बड़ी उथली बात है। साथ दे नहीं सकता यह यथार्थ है। साथ देता नहीं, साथ दे ही नहीं सकता। हमें ऐसा लगता है, कि संसार में हम जिन्हें अपना मानते हैं, वे हमारे साथी हैं, यथार्थतः देखा जाए तो वे साथी नहीं। वे साथ निभा भी नहीं सकते। तुम्हारा सुख-दुःख तुम्हें अकेले ही भोगना पड़ेगा। तुम्हारा जन्म-मरण अकेले ही होता है। यहाँ आए तो अकेले ही आए, जाने की बारी आएगी तो अकेले ही जाना होगा। तुम्हारा कोई कितना भी आत्मीय क्यों न हो, तुम्हारा कोई कितना भी प्रिय क्यों न हो, तुम्हारी किससे कितनी भी प्रगाढ़ता क्यों न हो, वह केवल ऊपरी स्तर तक है। आत्मा के स्तर पर कोई किसी से जुड़ नहीं सकता। आपके सिर में दर्द हो तो तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारे आत्मीयजन, तुम्हारे सिर में दवा लगा सकते हैं। तुम्हारे सिर को दबा सकते हैं, तुम्हारे बगल में बैठकर सहानुभूति के दो शब्द सुना सकते हैं। लेकिन तुम्हारी पीड़ा को ले नहीं सकते। यही व्यक्ति की मजबूरी है। यहीं एकत्व की प्रतीति होती है। यह जीवन की परम अनिवार्यता है, यथार्थ है। कोई किसी का कभी साथ नहीं देता। साथ दे भी नहीं सकता । क्योंकि प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी को स्वतन्त्र बनाया है। अकेला बनाया है। एकाकी बनाया है। जब वह अपने एकत्व की अनुभूति में डूब जाता है, तभी उसके जीवन का परम सौन्दर्य निखरता है। एकत्व में परम सौन्दर्य है और अनेकत्व में विखण्डन । जब हम एकत्व से बाहर जाते हैं, हमारा चित्त विखण्डित होता है। पर में बँटता है। और जब हम स्वयं में केन्द्रित हो जाते हैं तो हमारा चित्त स्व में केन्द्रित होता है। संत कहते हैं तुम्हारे भीतर तुम्हारा परमात्मा है। जिस क्षण तुम उस परमात्मा की अनुभूति कर लोगे, तुम्हारे लिए कोई अनुभूति शेष नहीं रहेगी ।