दिव्य विचार: जिंदगी की वास्तविकता को पहचानने की कोशिश करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि संसार की वास्तविकता को अच्छे से जो समझ लेता है वह संसार में फिर रच-पच नहीं सकता। अध्यात्म से उसके भीतर एक क्रान्ति घटित होती है, जो उसे संन्यास की ओर घसीट ले जाती है। मैं तुम्हें संन्यासी बनने का कोई उपदेश नहीं दे रहा हूँ। क्योंकि किसी के उपदेश से कोई संन्यासी नहीं बन सकता। संन्यास कोई साधारण घटना नहीं है। यह एक बहुत बड़ी उद्घटना है। जब व्यक्ति के भीतर कोई आध्यात्मिक उद्ङ्क्रान्ति घटित होती है तो संन्यास का जन्म होता है। वस्तुतः जब संसार का अन्त होता है, तभी सन्त का जन्म होता है। और आशाओं का अभाव होता है तो संन्यास प्रकट होता है। वह जब हो तो हो। मैं आप सबसे इतना ज़रूर कहता हूं कि तुम संसार में रहो ज़रूर, लेकिन संसार में रहकर भी सांसारिकता से अप्रभावित रहो । संसार भावना का एक भाव यह भी है कि तुम संसार में रहते हुए भी सांसारिकता के दुःख-कष्ट के प्रभाव से अछूते रहो। यह कला जान लो, और वह कला है संतोष की कला, जो जीवन की परम कला है। मूल कला है। उसे समझे बिना जीवन की मूर्छा घटेगी नहीं। उसके घटने पर ही ये सब कुछ चीजें घटेगीं। अन्यथा अपना रोना रोते रहोगे और अपनी जिंदगी को यूँ ही खोते रहोगे । अन्य जिंदगी की तरह कहीं ये जिंदगी भी न बीत जाये। अपनी जिंदगी की वास्तविकता को पहचानने की कोशिश करो। बस हकीकत की नज़र डालने की कोशिश करो। बारह भावना हमें हकीकत की नज़र डालने की बात सिखलाती हैं। वह मार्ग सिखाती है जो हमारे जीवन में घटित हो और उसी मार्ग पर चलकर हम अपने जीवन को आगे बढा सकें। यही भगवान् महावीर का संदेश है और यही समस्त तीर्थंकरों का संदेश है और यही समस्त दुनिया के महापुरुषों के जीवन का संदेश है। वस्तुतः जब हम अध्यात्म की बात करते हैं तो उसमें कोई भी विभेद नहीं होता।






