दिव्य विचार: ऊपर के श्रृंगार से पवित्रता नहीं आती- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आप कभी विचार करो कि किसी व्यक्ति ने आपके हाथ में रसगुल्ला दिया हो, उसे मुँह में मुँह से निकालकर किसी से कहो कि ये रसगुल्ला ले लो, तो क्या दूसरा कोई व्यक्ति लेना पसंद करेगा ? क्या हो गया उसमें ? उस रसगुल्ले में कहाँ से आई विकृति ? बस हमारे शरीर का स्पर्श हो गया, जैसे ही हमारे शरीर का स्पर्श होता है, अच्छी चीज़ भी बुरी हो जाती है। संत कहते हैं - शरीर के श्रृंगार में मत उलझो, उसे सजाया ही नहीं जा सकता। कोई लाख प्रयास करे, शरीर सज-सॅवर ही नहीं सकता। कोयले को कितना भी धोने का प्रयास करो, क्या कोयले में सफेदी आ सकती है ? कतई नहीं। यह उसका स्वभाव है। कोयले में सफेदी लाना चाहो तो उसे धोने की जरूरत नहीं, उसे जलाने की जरूरत है। जिस क्षण कोयला जलेगा उसका स्वरूप चाँदी की तरह उज्ज्वल हो जायेगा। तुम्हारे तन में पवित्रता ऊपर के श्रृंगार से नहीं आती, तुम्हारे तन की पवित्रता आत्मा की साधना से होती है, तपस्या से होती है। जो तप और साधना के मार्ग को अंगीकार कर लेता है, अपने आचरण में पवित्रता ले आता है उस व्यक्ति द्वारा स्पर्शित रज को लोग माथे पर लगाने को लालायित हो उठते हैं। वस्तुतः यह धूल की पवित्रता नहीं है, चरणों की पवित्रता नहीं, अपितु आचरण की ही पवित्रता है। पवित्रता त्याग से आती है। पवित्रता तपस्या से आती है। इसलिये अपने जीवन को पवित्र करना चाहते हो तो बाहर से नहीं, भीतर से पवित्र होईये ! आज मनुष्य की स्थिति थोड़ी विचित्र है, वह तन को माँजता है, मन को माँजने का प्रयास नहीं करता। संत कहते हैं -तन को नहीं, मन को माँजने का प्रयास करो। अशुचि भावना तन की अशुचिता का बोध कराते हुए कहती है कि तन अशुचि है, इसमें ज्यादा मत उलझो, इसके लिये तुम जितना प्रयास करोगे सब निरर्थक होगा। यह शुद्ध कभी हो नहीं सकता। सारे सागर के जल से भी शुद्ध करने का प्रयास करो तो भी यह शुद्ध होने वाला नहीं है। मलिनता इसका स्वभाव है और यदि तुम अपने मन को विशुद्ध बना लो तो फिर तन भी शुद्ध हो जाएगा। पूज्य हो जाएगा।






