दिव्य विचार: देह का नही, रूह का श्रृंगार करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि तन की तरफ नहीं, बल्कि अपने भीतर के चेतन की तरफ देखने की कोशिश करो। तन से आसक्ति छोड़ो, चेतन से अनुरक्ति बढ़ाओ। देह का श्रृंगार खूब किया, रुह का श्रृंगार कीजिये । वस्तुतःतोड़िये न फूल शाख से, खुशबुओं से प्यार कीजिये । जिस दिन हमारी दृष्टि फूल से हटकर खुशबू पर केन्द्रित हो जायेगी, समझ लेना सच्चे अर्थ में हमारे अन्तरंग में आध्यात्मिक चेतना का आविर्भाव हो गया है। देह का श्रृंगार करना, मतलब कचरे के ढेर पर सेंट उड़ेलना है। यदि ऐसा करते हो तो सेंट भी कचरे में परिवर्तित हो जायेगा, और कुछ नहीं होगा। व्यर्थ ही जायेगा। संत कहते हैं सेंट डालकर कचरे को सुगन्धित करने का प्रयास मत करो। कचरे की जगह में खुशबू लाना चाहते हो तो पहले उस कचरे को हटाओ, सूरज की तेज किरणें पड़ेगी तो वहाँ की दुर्गन्ध हटेगी और वहाँ की मिट्टी की सोंधी महक अपने आप प्रकट हो जायेगी। पहले तुम्हारे भीतर जो कचरा भरा है, उस कचरे को बाहर निकालो, तो आत्मा की सुवास स्वयमेव प्रकट हो जायेगी। कोई मल भरे मटके को फूलों से सजा दे तो हम क्या कहेंगे ? जिस मटके में मल भरा हो, विष्टा भरी हो, उसे फूलों से कोई सजाये। ठीक है, फूलों की सजावट आकर्षक लग सकती है, लेकिन उसकी सड़ांध से हम अपने आपको बचा नहीं सकते, उसकी बदबू से अपने आपको बचाया नहीं जा सकता। बदबू तो चाहे-अनचाहे प्रकट होगी ही और हमारी नासिका को पीड़ा पहुँचाये बगैर नहीं रह सकती। और अगर उस मटके में छोटा-सा छेद हो जाये तो फिर भीतर का सारा मेटेरियल बाहर आने में देर नहीं लगेगी। यह मटका है, सजा हुआ है, जैसे ही इस मटके में छेद होता है, तब हम अपने ही रूप से स्वयं घृणा करने लगते हैं। संत कहते हैं - किस रूप पर तुम मुग्ध होते हो, किस शरीर पर आसक्त होते हो, इस शरीर को देखो, मक्खी के पंख के बराबर पतली सी शरीर की चमड़ी की एक पर्त निकल जाय तो हम खुद अपनी काया से घृणा करने लगें। यह इसकी वास्तविकता है, यह इसके भीतर का तत्त्व है।






