दिव्य विचार: सजने-संवरने में ज्यादा मत उलझो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: सजने-संवरने में ज्यादा मत उलझो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि असंयम से बचना है तो शरीर की वास्तविकता को पहचानने की कोशिश करें, थोड़ा अपने भीतर झाँककर देखो कि आखिर तुम्हारे शरीर में है क्या ? तुम्हारे शरीर में नौ द्वार हैं, जिनसे निरन्तर मल बहते रहते हैं। वे नौ द्वार ऐसे हैं जिनका नाम लेने से घृणा का अनुभव होता है। हमारे भीतर का जो मेटेरियल है, यदि बाहर निकल आये तो हमें अपनी ही नाक पर रुमाल रखना पड़ेगा। हमारे शरीर में क्या है ? हाड़-माँस है, मल-मूत्र है, और क्या है ! सात धातुओं के अलावा हमारे शरीर में और है क्या ? थोड़ा हिसाब लगा कर देखो, अपने शरीर का पोस्टमार्टम करो, क्या मिलेगा तुम्हें अपने शरीर में ? जो पदार्थ है तुम देख नहीं पाओगे। देखकर तुम्हारे मन में घृणा भर जायेगी। बदबू के कारण नाक पर रुमाल रखना पड़ेगा। वस्तुतः यह शरीर का स्वभाव है। अपने आपसे पूछें क्या है इस शरीर में ? कोई डाक्टर पोस्टमार्टम करता होगा तो वह बता देगा तुम्हारे शरीर में कितनी हड्डियाँ हैं, कितनी नसें हैं, कितनी आँते हैं? रक्त है, माँस है, मल-मूत्र है, इसके अलावा क्या है ? यही तुम्हारी पर्सनॉलिटी है। बस ऊपर से ढक दिया गया है तो पता नहीं चलता। संत कहते हैं - शरीर की वास्तविकता को पहचानो। देहदृष्टि से मुक्त होकर आत्मदृष्टा बनने का प्रयास करो। जब तुम्हारे भीतर इस आत्मदर्शन की भूमिका प्रकट होगी तभी तुम अपने जीवन में कोई आध्यात्मिक रूपान्तरण घटित कर सकोगे। शरीर का तो स्वभाव ही यह है, इसलिये शरीर के ऊपर ज्यादा आसक्त न हो, शरीर को सजाने-संवारने में ज्यादा मत उलझो। न स्वयं के शरीर पर मुग्ध होओ और न दूसरों के शरीर पर आकृष्ट होओ। शरीर के स्पर्शजन्य सुख की लालसा मनुष्य को अशान्त ही करती है, पाप में निमग्न ही करती है। शरीर का स्वभाव कैसा है ? हम अपने शरीर पर दुनिया की पवित्रतम वस्तु भी लगायें, तो शरीर पर लगाते ही वे पवित्रतम वस्तुएँ भी अपवित्र हो जाती हैं। गंगा के पवित्र जल से भी हम अपने शरीर को पवित्र नहीं कर सकते। हकीकत तो यह है कि शरीर के स्पर्श से गंगा का पवित्र जल भी अपवित्र हो जाता है।