दिव्य विचार: सुख-दुख अकेले ही भोगना है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: सुख-दुख अकेले ही भोगना है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि इस संसार की अन्तहीन यात्रा में जो मैने जन्म-मरण किया, सुख-दुःख भोगा वह सब मैने अकेले ही भोगा। मेरा कोई संगी-साथी नहीं रहा। मैं क्या इस जगत् का प्रत्येक प्राणी अपने जन्म-मरण, सुख-दुःख को अकेले ही भोगता है।-हमने अन्यत्वभावना में महसूस किया कि मैं अकेला तो हूँ ही, सबसे अलग भी हूँ। अब आज की भावना है अशुचिभावना। यह हमारे चिन्तन को और आगे ले जाती है। यह कहती है - देखो, जो तुम्हारा शरीर के साथ सम्बन्ध है, वह बड़ा नज़दीकी सम्बन्ध है। लेकिन शरीर के स्वभाव को पहचानो, शरीर स्वभावतः अशुचि है। तुम अपने शरीर की आसक्ति में उलझ कर अपने जीवन का अकल्याण करते हो । शरीर के स्वरूप को समझो और भीतर के शरीरी को पहचानने का प्रयास करो। देह को देखो और विदेह की तरफ दृष्टि केन्द्रित करने की कोशिश करो। जड़ से चेतन की ओर उन्मुख होने का प्रयास करो। अशुचि भावना शरीर की वास्तविकता का दर्शन करने की प्रेरणा देती है और हमें देहानुराग से आत्मानुरागी बनने का दर्शन देती है। वह कहती है कि देहदृष्टि से मुक्त होकर देहात्म बोध से मुक्त होकर आत्मा में जीने का प्रयास करें। बारह भावना में अशुचिभावना का चित्रण करते हुए कवि कहते हैं -

दिपे चाम चादर मढ़ी, हाड पींजरा देह ।

भीतर या सम जगत में और नहीं घिन गेह ॥

हम अपने शरीर को देखते हैं, ऊपर से वह बड़ा अप-टू-डेट (up-to-date) दिखाई पड़ता है। संत कहते हैं - ऊपर से गोरा, सुन्दर, सलौना, आकर्षक दिखाई पड़ने वाली यह काया आखिर भीतर से क्या है ? इसे देखने की कोशिश करो। यह तो भीतर से ऐसे ही हाड़-माँस का पुतला है। ऊपर से चर्म की खोली लपेट दी गई है, प्रकृति ने एक व्यवस्था कर दी है। इसलिये हमें यह सुन्दर दिखलाई पड़ती है और हम इस पर मुग्ध होते रहते हैं, अपने शरीर के प्रति, दूसरों के शरीर के प्रति, स्व और पर के शरीर के प्रति आसक्ति ही मनुष्य के जीवन में असंयम को जन्म देती हैं।