दिव्य विचार: अपने भीतर के अविनाशी तत्व को पहचानो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: अपने भीतर के अविनाशी तत्व को पहचानो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अनित्यभावना से हमारे चिन्तन की यात्रा प्रारम्भ हुई और हमने यह महसूस किया कि प्रत्येक भावना में हम शरीरादि बाहरी संयोगों की नश्वरता को समझते हुए आत्मा पर केन्द्रित होने का प्रयास करते रहे। वस्तुतः भावना का मूल लक्ष्य यही है कि बाहरी संयोगों से वैराग्य हो और अपने भीतर के तत्व के प्रति अनुराग हो, ये दोनों घटनाएँ एक साथ घटित होती हैं। जैसे-जैसे बाहर से वैराग्य होता है वैसे-वैसे भीतर के तत्त्व का अनुराग बढ़ता है और जैसे-जैसे भीतर के तत्त्व का अनुराग बढ़ता है, वैसे-वैसे बाहर के पदार्थों से वैराग्य बढ़ने लगता है। भीतर का आकर्षण बाहर का विकर्षण, बाहर का विकर्षण भीतर का आकर्षण ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और यही चलता रहता है। हम देख रहे हैं कि एक-एक भावना से बढ़ते-बढ़ते हमारा ध्यान छठी भावना पर केन्द्रित होने जा रहा है। पहली भावना में हमने देखा, जगत् के सारे पदार्थ अनित्य हैं, शरीर नाशवान है कोई कितना भी प्रयास करे, शरीर को सुरक्षित रखा नहीं जा सकता। जगत् में जो भी आया है नष्ट होने वाला है, विनाशधर्मा है, एक मात्र हमारा आत्मतत्त्व ही अजर-अमर अविनाशी है। अशरणभावना में हमने मृत्यु की अनिवार्यता को समझा, यह जाना कि जिसकी उत्पत्ति हुई है उसका विनाश होगा। मृत्यु से कभी भी, कोई भी, किसी भी स्थिति में बच नहीं सकता । इसके लिए हम कितना भी प्रयास कर लें। इसके लिए एक ही रास्ता है, कि हम अपने के भीतर अजर-अमर, अविनाशी तत्त्व पर अपनी दृष्टि केन्द्रित करें। फिर संसार भावना में हमने महसूस किया कि जन्म-मरण के इस अन्तहीन प्रवाह में संसार की चार गतियों और चौरासी लाख योनियों में भटक भटक कर हमने न जाने कितने दुःख पाये। आज तक जो कुछ भी हमारे संसार का अनुभव है, वह केवल दुःख है, शोक हैं, पीड़ा है, संताप है, इसके अतिरिक्त संसार के प्रत्येक प्राणी का कोई भी दूसरा अनुभव नहीं। वस्तुतः संसार दुःख की ही पर्याय है।