दिव्य विचार: हमारे दुखों का कारण कर्मबंधन- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि कर्म का बंधन दुखदाई है। भव-भव से कर्मबंधन के कारण हम संसार के दुःखों को भोगते आ रहे हैं। यह बन्धन किसी के द्वारा आरोपित नहीं है। स्वयं के द्वारा सृजित है। जो बंधन हमारे दुःख का कारण है, उसे हमने खुद सृजा है। जब तक हम इस बंधन को नष्ट नहीं कर लेते, तब तक हमारी आत्मा को शाश्वत शान्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती। विगत दिनों कर्मबन्धन से अपनी आत्मा को बचाने की बात की गई। संवर वह माध्यम है जो हमें कर्म के बंधनों से बचाता है। पर संत कहते हैं कि केवल बंधन से बचने मात्र से तुम्हारी सुरक्षा नहीं हो सकती। नये कर्म के बंधन से बच जाने मात्र से तुम्हारा उद्धार नहीं है। तुम्हारा कल्याण तो तब संभव है, जब नये कर्मों के आगमन से बचने के साथ-साथ चिरसंचित कर्मों की सत्ता को भी उखाड़ने का प्रयास करो, नाव के छेद को बंद कर देना मात्र पर्याप्त नहीं है। छेद को बंद करने के साथ-साथ पूर्व से भरे हुये पानी को उलीचना भी ज़रूरी है। संत कहते हैं - तुम्हें अपनी आत्मा का विशुद्ध स्वरूप प्राप्त करना है तो न केवल नये कर्म के बंधन से बचो, अपितु अनादि से कर्म का बंधन तुम्हारी आत्मा से जुड़ा हुआ है, उसे भी काटने का प्रयत्न करो, उसे नष्ट करो, कर्मों को झड़ाने का नाम निर्जरा है। आत्मा में चिर-संचित कर्म की सत्ता के उन्मूलन का नाम निर्जरा है। जब तक हम आत्मा में संचित कर्मों को आत्मा से पृथक् नहीं कर लेते तब तक आत्मा के विशुद्ध स्वरूप की अभिव्यक्ति नहीं होती। जैसे स्वर्णपाषाण से अनादि से कालिमा और किट्टिमा जुड़ी रहती है। जब तक उसकी कालिमा-किट्टिमा को पृथक् नहीं किया जाता, उसका शुद्ध स्वर्ण प्रकट नहीं हो पाता। उस कालिमा को तपाकर गलाकर अलग करने से उसके अन्दर रहने वाला शुद्ध स्वर्ण निखर उठता है। संत कहते हैं- ऐसी स्थिति हमारी आत्मा की है, आत्मा स्वभावतः शुद्ध होने के बाद भी अनादि से कर्म के बन्धन से बंधी हुई है। जब तक आत्मा पर चढ़े हुए कर्म के कालुष्य का अभाव नहीं हो जाता तब तक आत्मा का शुद्ध स्वरूप निखर कर प्रकट नहीं हो सकता।






