दिव्य विचार: मन के उद्वेग को नियंत्रित करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बन्धुओ ! इस सबके लिए समता का अभ्यास बहुत जरूरी है। धीरज और समता ये दोनों ही आध्यात्मिक गुण हैं। जिनके बल पर हम तमाम प्रकार की प्रतिकूलताओं को समता से सहने में समर्थ हो सकते हैं। हम आपसे कहते हैं कि मन के उद्वेग को नियन्त्रित करो। मन में उद्वेग तभी आता है जब मन में प्रतिकूलता होती है। उस समय हमारे मन में धीरज या समता हो तो हम उन्हें सहजता से सहने में समर्थ हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में समता बनाये रखना चाहिए। कर्मों के उदय में जब कभी ऐसी स्थिति आए तो अपने मन की समता खण्डित न होने दें। होता क्या है ? कर्मों के उदय से जो भी सुख-दुःख उत्पन्न होता है तो हम उस सुख में हर्षित और दुःख में विषाद करने लगते हैं। हमारे अन्दर रागद्वेष उत्पन्न होने लगता है और इसी रागद्वेष के परिणाम स्वरूप नए कर्म कई गुने बंध जाते हैं। हम अपने चित्त की भाव-भूमि में कर्म के बीज डालते रहते हैं। जो अंकुरित होकर हजारों की संख्या में वृक्षों को पैदा कर देते हैं। तब कर्म की सम्पत्ति आखिर नष्ट कैसे होगी ? संत कहते हैं - कर्म के उदय में जो कर्म के बीज आ रहे हैं उन्हें अपनी चित्त की भाव- - भूमि में बोओ मत। उसे अपनी समता की आँच में भून दो। यदि एक बार भुन गया तो उसमें अंकुरण की क्षमता स्वयमेव नष्ट हो जाएगी। फिर कभी उग नहीं सकता। फिर रागद्वेष की प्रवृत्ति पनप नहीं सकती। तभी सच्चे अध्यात्म का आनन्द लिया जा सकता है। लेकिन हम सुविधावादी लोगों में शामिल हैं, जैसे जी रहे हैं वैसे ही जीते रहना चाहते हैं। इसके साथ ही अपना कल्याण भी चाहते हैं, जो कभी संभव नहीं है। परिवर्तन करना पड़ेगा। जिस तरह से आप जी रहे हैं, उसी तरह से जिओगे तो, वही मिलेगा जो अब तक मिला है। सुख, शान्ति और स्थायी समृद्धि चाहते हो तो अध्यात्म के मार्ग को अंगीकार करना पड़ेगा। अध्यात्म का मार्ग कष्टप्रद होता है। पर इससे त्रैकालिक शान्ति प्राप्त होती है। संसार के लोग तात्कालिक कष्टों से घबराकर त्रैकालिक कष्टों को आमन्त्रित कर लेते हैं।






