दिव्य विचार: वाणी का दुरूपयोग नहीं करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आप देखिए, आपके मुख से कितने अपशब्द निकलते हैं। कई-कई लोगों का तकिया कलाम अपशब्द ही होता है। उनको होश-हवास ही नहीं होता कि हमें वाणी एक बहुत बड़ी सम्पदा के रूप में प्राप्त हुई है। इसका दुरुपयोग नहीं, सदुपयोग करना चाहिए। संसार में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके पास वाणी के साथ भाषा भी है। जिसके माध्यम से वह अपनी भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाने में समर्थ होता है। इसका सदुपयोग करें। पुण्य के उदय से वाणी मिली है। यदि आप अपशब्द बोलते हैं या वचनों से दुव्यवहार करते हैं तो उसका दुष्परिणाम स्वयं के साथ दूसरों को भी भोगना पड़ता है, पड़ सकता है। संत कहते हैं वाणी की प्रवृत्ति जागरूक होकर करो। अपनी वाणी का दुरुपयोग करने से वाणी कुण्ठित हो जाती है। कभी-कभी उन्हें मूक भी हो जाना पड़ता है। कम से कम बोलो। बोलो तो अच्छा बोलो। जिह्वा मिली है तो गाओ, लेकिन प्रभु के गुण गाओ। किसी के गुण गाओ। कभी किसी को गाली मत दो, कभी किसी की निन्दा मत करो। कर सको तो किसी की पूजा या प्रशंसा करो। किसी को प्रताड़ित मत करो। कभी किसी को पीड़ा मत पहुँचाओ। यदि ऐसा करते हो तो तुम अपनी वाणी को साक्षरता प्रदान करने में सक्षम हो सकते हो। नहीं तो तुम वचनों से न जाने कितने पाप संचित करते हो। काया का कायोत्सर्ग शरीर की कुचेष्टाओं से बचने का प्रयत्न करो। चलने-फिरने, उठने-बैठने, खाने-पीने आदि शरीर की तमाम क्रियाओं में हम अहिंसा का ध्यान रखें। बन्धुओ ! धर्म का प्राणतत्त्व अहिंसा ही है। अहिंसा के अभाव में कोई धर्म नहीं पल सकता। वस्तुतः दुनिया के समस्त धर्मों को हम केन्द्रित करना चाहें तो केवल अहिंसा के नाम पर केन्द्रित हो सकते हैं। क्योंकि अहिंसा ही सर्वत्र धर्म के रूप में मान्य है। यद्यपि प्रत्येक प्रवृत्ति से हम पाप का अर्जन कर रहे हैं। उठने-बैठने, चलने-फिरने, खाते-पीते समय इस बात का ध्यान रखना कि हम हिंसा से बच सकें।






