दिव्य विचार: अज्ञानता के कारण हमसे कर्म बंधते हैं-:मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि कर्म के कालुष्य का अभाव नहीं हो जाता तब तक आत्मा का शुद्ध स्वरूप निखर कर प्रकट नहीं हो सकता। उस आत्मा के शुद्ध स्वरूप को निखारने के लिये चिर-संचित कालिमा का निष्कासन जरूरी है। उसका संशोधन जरूरी है। आत्मा के विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त करने का सौभाग्य अर्जित कर सकते हैं। चिर-संचित कर्मों की सत्ता का उच्छेद जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए । जन्म-हैं जन्मान्तरों से हम अपने कर्म को बाँधते आये हैं, उन कर्मों को नष्ट कैसे करें ? निर्जराभावना में केवल उसका ही चिन्तन किया जाता है। बंधे हुए कर्म को विलग करने की प्रक्रिया का नाम ही निर्जरा है। अज्ञानता के कारण कर्म बंधते हैं, आसक्ति के कारण कर्म चिपकते हैं, जब हमारी अज्ञानता और आसक्ति खत्म होती है तो कर्मों के झड़ने की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हो जाती है। जैन अध्यात्म के प्रवर्तक आचार्य कुन्दकुन्द से जब पूछा गया कि भगवन् ! कर्म बन्धन का कारण क्या है और उससे मुक्ति का उपाय क्या है ? तो उन्होंने एक गाथा के माध्यम से बड़ा सटीक समाधान किया। वे कहते हैं -
रत्तो बंधदि कम्मं, मुंचदि जीवो विरायसंपण्णो।
एसो बंधसमासो तम्हा कम्मेसु मा रज्झ ॥
जीव राग के कारण कर्म का बंधन करता है और रागरहित आत्मा, विराग सम्पन्न आत्मा कर्म से मुक्त होता है। ऐसा बंध का समास है। इसलिये यदि तुम अपने आपको बंधन से मुक्त रखना चाहते हो तो राग से बचो, वीतरागता को प्राप्त करो। सीधी-सी बात है, दो धारायें हैं - एक राग की धारा और दूसरी वीतरागता की धारा । राग की धारा कर्म का बंधन कराती है और वीतरागता की धारा से कर्म का बंधन कटता है। विराग कर्म बंधन को खत्म करता है और राग कर्मबंधन को बढ़ाता है। जिसके जीवन में जितनी अधिक राग या आसक्ति की प्रबलता होगी उसका बंधन उतना ही प्रगाढ़ होगा। और जो जितना राग रहित होगा, वीतरागता से जुड़ा होगा, उसका बंधन उतना ही नष्ट होता जाता है। यदि हमारे शरीर में तैल लगा हो और धूल में खेलें तो सारी धूल तैल से चिपक जाती है। लेकिन सूखे वदन में धूल कभी नहीं चिपकती।






