दिव्य विचार: तप और त्याग का मार्ग अपनाएं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: तप और त्याग का मार्ग अपनाएं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि यह राग वह चिकनाई है जो बंधन कराती है, जिस मनुष्य के जीवन में जितनी वीतरागता बढ़ती जाती है, विरागता बढ़ती जाती है, कर्मबंधन उतना ही शिथिल होने लगता है। हमारी स्थिति उल्टी है, हम राग के क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं और कर्म बंधन से बचना चाहते हैं, कैसे संभव होगा ? राग की धारा जब तक बहती रहेगी हम कर्मबंधन से अपनी आत्मा को बचा नहीं सकते । हमारे अन्तरंग में विराग की धारा का आविर्भाव होना चाहिए, विराग की धारा को फूटना चाहिए, बहना चाहिए। विराग की धारा तो दिनों-दिन सूख रही है और राग की धारा में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है, तो ऐसे में हमारे जीवन का कल्याण आखिर कैसे होगा ? संत कहते हैं - विराग की धारा तुम्हारे अन्तरंग में जिस क्षण प्रकट होने लगेगी, उसी क्षण तुम्हारे चिर-संचित कर्मों का बंधन ढीला पड़ने लगेगा। उसके लिये तुम्हें तप का मार्ग अपनाने की जरुरत है। त्याग का मार्ग अपनाने की जरूरत है। तुम्हें सबसे विलग होकर अपनी आत्मा में केन्द्रित होने की जरूरत है। आप कहोगे - महाराज, इतनी सब बातें तो हम गृहस्थों के जीवन में संभव ही नहीं हैं और सबसे नाता तोड़ कर साधु-संन्यासी बन जाय, तभी कर्म की निर्जरा कर सकेंगे, तो ऐसी निर्जरा भावना हमारे किस काम की ? ठीक कह रहे हो आप। अगर हम निर्जरा के लिये तप-त्याग को ही अनिवार्य माने तो यह निर्जरा आपके लिये किसी काम की नहीं। लेकिन बन्धुओ ! हमारी साधना केवल साधुओं तक ही सीमित नहीं है। क्योंकि गृहस्थ त्याग-तपस्या का मार्ग अंगीकार नहीं कर सकता । घर-परिवार से नाता नहीं तोड़ सकता, उन सबके बीच जीना उसकी नियति है, पर संत कहते हैं कि कर्म की निर्जरा के लिये संन्यास जरूरी नहीं है। यदि व्यक्ति के अन्दर आन्तरिक निःस्पृहता प्रकट हो जाय, अनासक्ति का भाव उत्पन्न हो जाये, समता का अभ्यासबन जाय तो गृहस्थ भी कर्म की निर्जरा का अधिकारी बन सकता है। साधना का राजमार्ग,, बन्धुओ ! संन्यास का भार्ग साधना का राजमार्ग है, लेकिन केवल एक ही मार्ग नहीं है।