दिव्य विचार: मन को प्रसन्न रखना भी बड़ी तपस्या - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: मन को प्रसन्न रखना भी बड़ी तपस्या - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जिसे हम बौद्धिक संन्यास कहते हैं, गीता में उसे मानस तप कहा गया है। यथा मनः प्रसादं सौम्यत्वं शौचमिन्द्रीय निग्रहःतपो मानस मुच्यते । मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, समता, मौन, आत्मदमन, पवित्रता, इन्द्रियों का निग्रह ये सब मानसिक तप हैं। तप से कर्म की निर्जरा होती है। मैं आपको बड़े-बड़े तप करने की बात कहूँ, तो आप कहेंगे महाराज, ये कहाँ संभव है। ये तपस्या हम नहीं कर सकते। कोई बात नहीं, मानसिक तपस्या तो की जा सकती है। पहली बात है मन को प्रसन्न बनाये रखना बहुत बड़ी तपस्या है। कर्म निर्जरा का अमूल्य साधन है। कर्म बंधन से बचने का बड़ा अच्छा उपाय है। हर परिस्थिति में प्रसन्न बने रहने की कला। महाराज ! यह कहाँ हो पाता है, हम तो बहाव में बह जाते हैं। जैसी परिस्थिति होती है वैसी परिणति बन जाती है। परिणति होगी तो भोगोगे । अपने दुःख को दूर करना चाहते हो, अपने कष्ट से मुक्त होना चाहते हो, तो जब तक इस कला को नहीं अपनाओगे तब तक कष्ट से मुक्ति तीन काल में संभव नहीं है। गृहस्थ के लिये मैं पहली बात कहता हूँ -गृहस्थ भले ही गृहस्थ हो, लेकिन भीतर से ऐसा संन्यासी हो सकता है कि जो हर स्थिति में समता का अभ्यासी हो जाय । गृहस्थी में भी अनासक्ति पूर्वक जिया जा सकता है। गृहस्थी में भी निःस्पृहता को अपना आदर्श बनाया जा सकता है और ऐसे ही गृहस्थों के लिये आचार्य समन्तभद्र कहते हैं - 

गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो निर्मोहो नैव मोहवान् ।

अनगारो गृही श्रेयान, निर्मोहो मोहिनो मुनिः ॥

एक मोही मुनि से निर्मोही गृहस्थ अच्छा है। यदि गृहस्थ निःस्पृहता पूर्वक जीता है, अपनी आसक्ति को क्षीण करके चलता है तो एक मोही मुनि से अच्छा है। बहुत गहरा उपदेश है इसे हम समझने की कोशिश करें। लेकिन ध्यान रखना, केवल वचनों की निःस्पृहता से तुम्हारा जीवन धन्य नहीं हो जायेगा। कुछ कहने और करने की स्थिति जब तक नहीं बनेगी, तब तक कुछ भी होने वाला नहीं।