दिव्य विचार: बंधन है तब तक दुख है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि 'ज्ञानी संसार में' रहता है, लेकिन संसार से अनासक्त रहने के कारण कर्म के बंधनों से बच जाता है और पूर्वबद्ध कर्मों की निर्जरा कर लेता है। जैसे सोना कीचड़ में लथपथ रहने के बाद भी कीचड़ के कण को ग्रहण नहीं करता। उससे अलिप्त रहता है। लेकिन अज्ञानी अपनी रागमूलक प्रवृत्ति के कारण, अपनी आसक्ति के कारण सांसारिक कार्यों में उलझ कर फँस जाता है, कर्म के बंधन को बाँध लेता है। वैसे ही जैसे लोहा कीचड़ में पड़ने पर जंग खा जाता है। हम देखे हमारी परिणति कैसी है ? सोने जैसी या लोहे जैसी। यदि सोने जैसी हो तो बँधन ज्यादा प्रभावी नहीं होंगे और लोहे जैसी परिणति है तो तुम्हें बंधन से कोई बचा नहीं सकता। लोहे जैसी प्रवृत्ति में बंधन है और सोने जैसी परिणति में वंदन है। अन्तर ज़्यादा नहीं है बँधन और वन्दन में। केवल एक ही अक्षर का अन्तर है द और ध का। लेकिन एक ही अक्षर का गुणात्मक अन्तर जमीन और आसमान जैसा है। बँधन है तब तक दुःख है, कष्ट है। जबकि वंदन तो पूजनीयता का भाव लिये हुए है, जो आत्मा की पवित्रता को उद्घाटित करता है। संत कहते हैं - इस मानस तप को अंगीकार करो, हर स्थिति में समता रखने का अभ्यास बनाओ। आता है तो, जाता है। अच्छा है तो बुरा भी है। यही प्रसन्नता का मूल मन्त्र है। हममें कभी हर्ष होता है, कभी विषाद होता है। अच्छा होता है तो प्रसन्न हो जाते हैं और बुरा होता है तो खिन्न हो जाते हैं। अनुकूल संयोग होते हैं तो हमारा मन प्रफुल्लित हो जाता है, प्रतिकूल संयोग होते ही मन में उद्विग्नता आ जाती है। कभी हम उत्साह से भरते हैं तो कभी उदासी से। मैं कहता हूँ - यह क्या है ? अपने जीवन को प्रत्येक दशा में सम बनाने की कोशिश करो, तभी समीचीन दृष्टि प्रकट होती है। जब तुम संसार के संयोगों को संयोग मानोगे, कर्म के आधीन जुड़े संयोग मानोगे, उसे अपनी आत्मा से पृथक् मानने का प्रयास करोगे। तब तुम्हारे भीतर यह समता प्रकट होगी। ऐसी समता से सम्पन्न ज्ञानी आत्मा संसार की तमाम क्रियाओं को करते रहने के बाद भी उलझता नहीं है।






