दिव्य विचार: जीवन को दर्पण की तरह बनाओ- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अपने जीवन को दर्पण की तरह बनाओ, दर्पण की बडी खासियत होती है। वह सबका स्वागत करता है, लेकिन संग्रह नहीं। दर्पण में जो कुछ भी आता है, वह उसे अपने में प्रतिबिम्बित कर लेता है। लेकिन किसी को रोककर नहीं रखता। जब तक प्रतिबिम्ब है तब तक प्रतिबिम्बित रहो और जब बिम्ब हटा तो प्रतिबिम्ब गया। दर्पण के आगे यदि आग जलाई जाए तो दर्पण जलता नहीं और दर्पण के आगे पानी रखा जाय तो दर्पण भीगता नहीं।
सुख दुःख दोनों बसत हैं ज्ञानी के घट मांही।
गिरि-सर दीसत मुकुर में भार भींज वो नाहीं॥
दर्पण में पहाड़ भी दिखता है, सरोवर भी दिखता है। न तो दर्पण पहाड़ के भार से भारी होता है और न ही सरोवर के पानी से भीगता है। ज्ञानी के जीवन में ऐसी ही मध्यस्थता बनी रहती है सुख और दुःख दोनों की स्थिति में, उसके मन की प्रसन्नता खण्डित नहीं हो पाती। न बहुत ज्यादा हर्ष और न बहुत ज़्यादा विषाद । न प्रसन्नता, न खिन्नता । मध्यस्थता, समता यह जीवन की एक बहुत बड़ी कला है। धीरे-धीरे अभ्यास से यह पायी जा सकती है। एक बड़ा गरीब व्यक्ति था, लेकिन वह जागरूक प्रज्ञा का धनी था। जागृत आत्मा था। उसका इकलौता बेटा संयोग से एक्सीडेंट में घायल हो गया । उसका एक पैर कट गया। बेटा हास्पिटल में एडमिट था। पर उस व्यक्ति के मन में किंचित भी शिकन तक नहीं थी। उसके एक मित्र ने उससे कहा- तुम्हारे बेटे की हालत बड़ी गम्भीर है। तुम्हारा एक मात्र बेटा तुम्हारे बुढ़ापे की लाठी, तुम्हारे जीवन का सहारा इन दिनों जन्म और मृत्यु से खेल रहा है। तुम्हें इस बात का कोई दुःख नहीं ? उस व्यक्ति ने जो जबाव दिया, वह बड़ा ही अर्थपूर्ण था। उसने कहा- मैं क्यों खिन्न होऊँ ! मैं जानता हूँ कि न मेरा जीवन शाश्वत है और न मेरे बेटे का। बेटा और मेरा सम्बन्ध जब तक होना होगा, होगा। मेरे रोने से बेटा रुकेगा नहीं और मेरे न रोने से बेटा जाने को होगा तो जाएगा ही। मेरे रोने या न रोने से मेरे बेटे के आने-जाने पर कोई फर्क नहीं होगा। जितने दिन तक मेरा और उसका संयोग है, रहेगा। मैं अपने बेटे के इस कष्ट को देखकर वर्तमान की प्रसन्नता को क्यों खोऊँ ?






