दिव्य विचार: किसी भी स्थिति में समता बनाए रखें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अनुकूल या प्रतिकूल संयोगों में जो समता बनाये रखता है, उसके जीवन में उसे बड़ी से बड़ी विपत्ति भी विचलित नहीं कर सकती। यह बहुत बड़ा तप है। कर्म का उदय होने पर भी प्रभावित नहीं होना, यह बहुत बड़ा तप है। साधना है। इसी से कर्म की निर्जरा होती है। ज्ञानी और अज्ञानी में यही अन्तर होता है। आचार्य कुन्दकुन्द कहते हैं - कर्म का उदय होगा, उस कर्म के उदय में सुख होगा, कभी दुःख होगा, जो कर्म के उदय में सुख मिलने पर सुखी होगा और दुःख मिलने पर दुःखी होगा, वह नये कर्म को बाँधेगा। उसके साथ कर्म का बंधन होगा। सुख होने पर सुखी होने वाला और दुःख होने पर दुःखी होने वाला बड़ा दुर्बल माना जाता है। वह कर्म के इशारे पर नाचने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के लिये नये कर्म का बंध होता है, लेकिन आचार्य कुन्दकुन्द बहुत गहराई की बात करते हैं - द्रव्य कर्म के उदय में अज्ञानी को सुख-दुःख होता है। ज्ञानी तो कर्म के उदय में सुखी और दुःखी दोनों ही नहीं होता। केवल उसका ज्ञाता बना रहता है। इसलिये वह कर्मों की निर्जरा करता है। कर्मोदय हो रहा है तो केवल उसके ज्ञाता बनो तुम्हारे सिर में दर्द हो रहा है तो समझो अभी कुछ पाप कर्म का उदय हो रहा है और वह जाते-जाते अपने जाने का अहसास दिला रहा है। उसे समझो, कि यह पर है, मेरा नहीं है। मेरा स्वरूप कर्म से भिन्न है। मैं उससे प्रभावित क्यों होऊँ ? सिर में दर्द होने पर मन में उसका दर्द हावी मत होने दो। उसके दृष्टा बने रहो। जो दर्द दो घंटे में ठीक होने वाला है, हो सकता है वह दस मिनट में ही ठीक हो जाय। उस घटना की जो प्रतिक्रिया है उससे बच जाओगे। कर्म के बंधन से बच जाओगे । बन्धुओ ! इसी को बोलते हैं साक्षीभाव। इसी को कहते हैं तटस्थता । साक्षीभाव क्या है ? जहाँ केवल दृष्टा बने रहना हो, दृश्य के साथ जुड़ाव नहीं हो । तटस्थ बने रहना । संत कहते हैं - कर्म की धार आ रही है उसे बह जाने दो। तुम तटस्थ खड़े रहो, उस धार के साथ तुम मत बहो। कितना भी कर्म का वेग आ जाय, उस समय अपनी समता को बरकरार रखो, कर्म की निर्जरा हो जायेगी। यह मानस तप बड़ा कठिन होता है।






