दिव्य विचार: ज्ञान की परिपूर्णता वैराग्य में ही है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अध्यात्म के क्षेत्र में पहली बात है ज्ञान की। आत्मज्ञान को हम प्राप्त करें। दूसरी बात है वैराग्य की। आत्मज्ञान को प्राप्त करने के उपरान्त वैराग्य के मार्ग को अंगीकार करें और इस दिशा में आगे बढ़ें, लेकिन इन बातों को लोग कम पसंद करते हैं। सीधे-सीधे अध्यात्म की बात तो हमें रुचिकर लगती है, ज्ञान की बात बड़ी रुचिकर लगती है, लेकिन विराग की बात हमें अच्छी नहीं लगती। विराग में कुछ छूटता-सा दिखता है। ज्ञान में कुछ छोड़ने की बात नहीं। बन्धुओ ! ध्यान रखना, ज्ञान की परिपूर्णता वैराग्य में ही है। सच्चा ज्ञान क्या है? सच्चा ज्ञान वह है जो श्रेय में लगाये और अश्रेय से हटाये। ज्ञान का फल ही वैराग्य है। ज्ञान की चरम परिणति का नाम ही वैराग्य है। आचार्य कुन्दकुन्द से पूछा गया -णाणस्स फलं किं ? अर्थात् ज्ञान का फल क्या है ? उन्होंने उत्तर दिया - उवेक्खा अर्थात् उपेक्षा ही ज्ञान का फल है। उपेक्षा का मतलब है वैराग्य । उपेक्षा का मतलब है उदासीनता । उपेक्षा का मतलब है विरक्ति का भाव। ज्ञान के साथ जब यह उपेक्षा जुड़ जाती है तो जीवन में परिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है। साधु पूर्ण उपेक्षा की भूमिका में जीते हैं। जबकि गृहस्थ पूर्णतः उपेक्षा को नहीं करता, लेकिन उदासीनता के मार्ग को अंगीकार करके आगे बढ़ने में समर्थ हो जाता है। ऐसी उदासीनता यदि जीवन में घटित होने लगे तो हमारे जीवनमें बहुत कुछ परिवर्तन हो सकता है। लेकिन क्या करें ? यह सब तो हमारे जीवन में बड़ा कष्टदायी लगता है। जब तक तुम्हें वैराग्य और ज्ञान का यह मार्ग, जो आत्मा के लिये हितकारी है, कष्टप्रद लगेगा, तब तक तुम अपने भव-भव के कष्ट को नष्ट नहीं कर सकते। उस कष्ट को नष्ट करने के लिये इस मार्ग को अंगीकार करना पड़ेगा। इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। इसको अंगीकार करिये। उसको अपने जीवन का ध्येय बनायें। जितना बन सके उतना अपनायें। मैं जानता हूँ आप मतलब की बात स्वीकार करते हैं। लेकिन मैं आपसे कहता हूँ -कि आप भले ही संन्यास को स्वीकार न कर सको पर अपनी बुद्धि का सत्य में न्यास तो कर सकते हो। सत्य के प्रति अनुराग तो जोड़ सकते हो। बौद्धिक संन्यास तो अंगीकार कर सकते हो।






