दिव्य विचार: ज्ञान के साथ वैराग्य को भी साधें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: ज्ञान के साथ वैराग्य को भी साधें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आज लोग हैं जो बंधन में बंधे ही नहीं है और बंधन को ही नियति मान बैठे हैं। उनको यह भ्रम है कि मेरा यह बंधन कभी टूट ही नहीं सकता। हम तो बंधे हुए हैं, जब तक ऐसी भ्रांति बनी रहेगी, बंधन का उन्मूलन नहीं हो सकता। और जब तक उन्मूलन नहीं होगा तब तक तुम्हारे जीवन में शान्ति की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। मान्यता ही बंधन है जो अज्ञान से उत्पन्न हुआ करती है। उस मान्यता के बंधन को हम काट सकते हैं यदि ज्ञान प्राप्त हो जाय, ज्ञान के साथ वैराग्य का पुट मिल जाय, थोड़ा समझे हमारे ऊपर बंधन कैसा है ? एक जगह सराय में ऊँटों की रेहड रुकी। बहुत सारे ऊँट थे। सब ऊँटों को बंधन में बाँध दिया गया। सारे ऊँट रात भर बैठे रहे। सुबह हुई सब ऊँटों का बंधन खोला गया। ऊँट रवाना हो गये लेकिन एक ऊँट उठा ही नहीं। वह बैठा का बैठा ही रहा। ऊँटों के मालिक ने कहा- क्या बात है, वह ऊँट उठ क्यों नहीं रहा। उसके बंधन खोलो। नौकरों ने कहा हमने उसका बंधन बाँधा ही नहीं। जिनके बंधन बाँधे थे सब खोल दिये। उस ऊँट पर बंधन बाँधा ही नहीं था तो खोलने की बात क्या है ? मालिक बोला- क्यों नहीं बाँधा । रस्सी कम पड़ गई थी। तब ऊँट रात भर बँधा कैसे रहा ? बस झूठ-मूठ उसके गले में हाथ फेरा कि रस्सी बाँध रहे हैं। मालिक ने कहा -जाओ उसके बँधन खोलो, तभी वह चलेगा। कैसे बँधन खोलें, बँधा ही नहीं है ? अरे, जैसे हाथ घुमाकर बंधन बाँधा था, वैसे ही हाथ घुमाकर बँधन खोलो। नौकर गये ऊँट की गर्दन पर उसी तरह से हाथ फेरा, जिस तरह सभी को खोला गया था, तो वह ऊँट तुरन्त ही उठ गया। बन्धुओ ! संत कहते हैं- यही है तुम्हारे बँधन का हाल। जैसे झूठ-मूठ की रस्सी बाँध दी गई तो ऊँट अपने को बँधा समझता है, ऐसे ही संसार का प्राणी अपने घर-परिवार या संसार के सम्बन्ध में इन सबसे अपने आपको बँधा महसूस करता है। जब तक तुम्हारी ऐसी मान्यता बनी रहेगी, भीतर के कर्म का बंधन टूटेगा नहीं। जिस क्षण तुम्हारी मान्यता बदलेगी, उसी क्षण तुम अपने आपको निर्बन्ध महसूस करोगे।