दिव्य विचार: पहले आत्मज्ञान को प्राप्त करो - मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि पहले आत्मज्ञान को प्राप्त करो और आत्मज्ञान के साथ-साथ वैराग्य भी तुम्हारे जीवन में बढ़े। जितना-जितना वैराग्य बढ़ेगा, विराग बढ़ेगा, आसक्ति नष्ट होगी, कर्मनिर्जरा का मार्ग उतना ही अधिक प्रशस्त हो सकेगा। बन्धुओं, यह कहाँ हो पाता है ? कर्मनिर्जरा की बात तो हम कभी सोचते ही नहीं । बन्धुओ ! कर्मनिर्जरा की बात केवल वही समझ पाता है जिसे बंधन की अनुभूति होती है। हमें, आपको, सबको बंधन से बँधे होने के बाद भी यह जरूरी नहीं कि बंधन की अनुभूति हो ही रही हो। बहुत से ऐसे लोग हैं जो संसार के बंधन में जी रहे हैं, लेकिन उनको पता ही नहीं कि मेरे ऊपर भी कोई बंधन है। कभी ऐसी अनुभूति होती है ? जब तक बंधन को समझोगे नहीं मुक्ति का प्रयास कैसे होगा। संत कहते हैं कि सच्चे अर्थों में मुक्ति के अधिकारी बनना चाहते हो तो अपने बंधन को पहचानने की कोशिश करो, बंधन को समझो, जिस क्षण तुम बंधन को पहचान जाओगे उसी क्षण तुम्हारे भीतर से मुक्ति का प्रयास प्रारम्भ हो जायेगा। बंधन को लोग समझते ही नहीं, मुक्ति का प्रयास करते नहीं, कैसे काम चलेगा ? कर्म की निर्जरा करना है तो बंधन को समझो। यह बंधन बाहर से आया हुआ है, तुम्हारे अज्ञान से उत्पन्न हुआ बंधन है। तुम्हारे अज्ञान की फलश्रुति है। जिस क्षण तुम्हारा यह अज्ञान खत्म होगा, बंधन रुकना शुरु हो जायगा। और जब बंधन रुकेगा तो तुम अपने वैराग्य के बल पर बंधे हुये कर्मो को नष्ट करने में समर्थ हो जाओगे। लेकिन यह सब बातें हमें बहुत कम समझ में आती हैं। कई लोग हैं जो अपने बंधन को जान तो लेते हैं लेकिन उसे काटने का प्रयास नहीं करते। मालूम है हम बंधन में बंधे हैं और बंधन को ही अपने जीवन की नियति मान लेने वाले व्यक्ति कभी अपने जीवन का उद्धार नहीं कर सकते। जो लोग गुलामी में जीने के अभ्यासी बन जाते हैं, उन्हें कभी मुक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती। मुक्ति वही प्राप्त करता है, जिनकी मानसिकता मुक्त हो । गुलाम व्यक्ति भी यदि अपनी मानसिकता को मुक्त रखता है, तो गुलामी में भी स्वतन्त्रता की अनुभूति कर सकता है।






