दिव्य विचार: ज्ञान के साथ तप साधना भी जरूरी- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: ज्ञान के साथ तप साधना भी जरूरी- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि केवल ज्ञान से काम नहीं होगा, ज्ञान के साथ तप-साधना भी जरूरी है। तप साधना का मतलब है वैराग्य। ज्ञान के साथ जब वैराग्य जुड़ता है, तब सच्चे अर्थों में अध्यात्मिक जीवन की शुरुआत होती है। आज संसार में ज्ञानियों की कमी नहीं है। लेकिन कोई ज़रूरी नहीं कि जिन्हें हम ज्ञानी मानते हैं वे वैराग्य सम्पन्न हों, केवल दीप से प्रकाश नहीं होता। प्रकाश को प्रकट करने के लिये उसमें तेल भी होना चाहिए। तेल से भींगी बाती होना भी ज़रूरी है। ज्ञान तो दीप है, वैराग्य है, उसके भीतर का तेल तपस्या है, उसके भीतर का तेल ज्ञानदीप का आधार है। बिना दीप के प्रकाश प्रकट नहीं होता। लेकिन बिना तेल के दीप भी अधूरा रहता है, ज्ञान की परिपूर्णता वैराग्य से समन्वित होने पर होती है वही ज्ञान सच्चा ज्ञान है जो वैराग्य से युक्त है। ज्ञान के साथ जब वैराग्य का पुट मिलता है तब हमारे आध्यात्मिक जीवन की परिपूर्णता होती है। संत कहते हैं - ज्ञान के साथ वैराग्य को भी प्राप्त करो। ज्ञान तुम्हारे जीवन की दिशा को निर्धारित करता है और वैराग्य तुम्हारे जीवन की दशा को परिवर्तित करता है, वैराग्य के बल पर हम अपने जीवन में आन्तरिक रूपान्तरण कर सकते हैं। बन्धुओ, अध्यात्म का जीवन एक बहुत बड़ा संग्राम है। यह योद्धाओं का मार्ग है। इस आध्यात्मिक युद्ध में यदि हम सफलता चाहते हैं तो केवल ज्ञान से संभव नहीं है। कोई व्यक्ति युद्ध के मैदान में जाय और युद्ध में तलवार लेकर अकेले लड़ना शुरु कर दे तो अकेले तलवार से अपने आपको बचा नहीं सकता, तलवार के साथ- साथ ढाल भी जरूरी है। संत कहते हैं जो आध्यात्मिक मार्ग में निकल पड़ते हैं, वे सच्चे अर्थों में अपने कर्म-शत्रुओं से जीतने में समर्थ हो जाते हैं। इसलिये धर्मात्मा मनुष्य के जीवन में हमेशा दो शक्तियाँ होती हैं - एक ज्ञान की शक्ति और दूसरी वैराग्य की शक्ति । ज्ञानहीन क्रियायें अर्थहीन होती हैं, लेकिन वैराग्य शून्य ज्ञान भी निरर्थक होता है।