दिव्य विचार: सन्यास का मतलब चेतना का अंतर्मुखी होना- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बन्धुओ ! मैं संन्यास दो प्रकार का मानता हूँ -पहला संन्यास वह जिसे हम बाहर का संन्यास कहते हैं, जिसे भेष का संन्यास कहते हैं और दूसरा संन्यास बुद्धि का संन्यास है, जो त्यागी-तपस्वी, मुनि, महात्मा हमें दिखाई पड़ते हैं वे भेष और बुद्धि के संन्यास से जुड़े होते हैं। वे सबसे पृथक् होकर अपना जीवन जीते हैं। संत कहते हैं - गृहस्थ भेष का संन्यासी भले न बन पाये, बुद्धि का संन्यासी जरूर बन सकता है। जिस क्षण तुम्हारे अन्दर बौद्धिक संन्यास प्रकट हो जायेगा समझ लेना सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर लिया और यही सम्यग्दर्शन तुम्हारे बन्धन को काटने में समर्थ होगा। बुद्धि के संन्यास का मतलब है चेतना का अन्तर्मुखी होना। बुद्धि के संन्यास का मतलब है अनासक्ति की भाव-भूमिका में जीने का अभ्यासी हो जाना, संसार के लगाव से अलग हो जाना, निःस्पृहता को बढ़ा लेना । जितनी अधिक निःस्पृहता बढ़ेगी, तुम कर्म के बंधन से उतना अधिक बचोगे, कर्म के बंधन से जितना बचोगे, पूर्व संचित कर्मों का उतना ही अधिक क्षय हो सकेगा। तुम वह सौभाग्य अर्जित कर सकोगे। इसलिये तुम उसकी तरफ दृष्टि को जोड़ने का प्रयास करो। ज्ञान-दीप तप तैल भर, घर शोधे भ्रम छोर । या विधि बिन निकसे नहीं, बैठे पूरब चोर ॥ बड़ी अच्छी प्रेरणा दी है- तुम अपने अन्तरंग का अन्तः निरीक्षण करो, तुम अपने घर में झाँक करके देखो, लेकिन क्या करोगे ? तुम्हें दिखता ही नहीं। घना अन्धकार छाया हुआ है। जब तक अंधेरा होगा तुम्हें सूझेगा भी कैसे ? इसलिये वहाँ प्रकाश की ज़रूरत है। प्रकाश लाओ। कौन-सा प्रकाश ? ज्ञान दीप तप तैल भर । ज्ञान के दीप में तप का तेल भरो, तब उससे अध्यात्म का प्रकाश प्रस्फुटित होगा। उस आलोक में तुम देखोगे अपने भीतर का स्वरूप। तब तुम्हें मालूम होगा कि कहाँ-कहाँ कर्म के चोर किस-किस रूप में तुम्हारी आत्मा में अपनी सत्ता जमाये हुए हैं। उन्हें देखो फिर एक-एक को खदेड़-खदेड़कर बाहर निकालने का प्रयास करो।






