दिव्य विचार: संसार की भीड़ में आप अकेले हैं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि मैं एकाकी हूँ। मेरी सारी यात्रा मुझे स्वयं ही करनी है। अपना सुख-दुःख मुझे स्वयं ही भोगना है। संसार में न मेरा कोई संगी है, न साथी है। मैं नितान्त अकेला हूँ। इस संसार की भीड़ में रहते हुए भी मैं अकेला हूँ। मैं निरा अकेला ही हूँ। इस प्रतीति का नाम एकत्वभावना है। विगत दिन हमने इस एकत्व की चर्चा की थी। अब आज हमारा चिन्तन और आगे बढ़ता है कि मैं अकेला तो हूँ ही, लेकिन संसार में सबसे अलग भी हूँ। मैं सबसे भिन्न हूँ, मेरा स्वरूप सबसे पृथक् है, कोई मेरी समानता नहीं कर सकता। मैं इन सबसे अलग हूँ, अनूठा हूँ, अनोखा हूँ, निराला हूँ। इस प्रतीति का नाम अन्यत्वभावना है। जगत् के जितने भी संयोग दिखाई पड़ रहे हैं, जगत् के जितने भी पदार्थ दृष्टिगोचर हो रहे हैं, वे सभी नहीं तथा मैं भी उन रूप नहीं हूँ। मैं इन सबसे भिन्न, अपना पृथक् स्वरूप धारण करने वाला हूँ। गहन आध्यात्मिक गहराई में उतरने के बाद यह आत्मबोध जागृत होता है। इस बोध की जागृति के बाद शरीर के तल से ऊपर उठकर आत्मा के स्तर पर जीने का अभ्यास बनता है। संसार में जितने भी संयोग हैं, वे मैं नहीं, मेरे भी नहीं। फिर मैं क्या हूँ ? सबसे अलग हूँ। मेरा स्वरूप सबसे पृथक, निराला है। मेरा शरीर जो दिख रहा है, वह मैं नहीं हूँ। मेरा जो नाम जुड़ा है, वह भी मैं नहीं हूँ। जो रूप या उपाधियाँ दिख रही हैं, वे भी मैं नहीं हूँ। संत कहते हैं - गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। मेरा नाम, रूप, उपाधियाँ और जो कुछ मेरे साथ जुड़ा है वह मैं नहीं हूँ। अपने स्वरूप की प्रतीति होना ही अन्यत्व की अनुभूति है। मैं हूँ सबसे अलग। जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, वह मैं नहीं हूँ। हमने परिवार अपने साथ नाम जोड़ा। आखिर यह नाम कब से जुड़ा ? पैदा होने के बाद, के लोगों ने एक दिन नाम रखा और हमने अपने आपको तद्रूप मानना प्रारम्भ कर दिया । संत कहते हैं जन्म के पहले तुम्हारा क्या नाम था और यह नाम आखिर कब तक टिका रहेगा ? मरने के बाद तुम्हारे नाम का क्या हाल होगा ? तुम कौन हो ? यदि यह नाम तुम्हारा है तो यह स्थायी होना चाहिए।






