दिव्य विचार: स्वार्थ से बचें, परमार्थ से जुड़े- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जब हम दूसरों से बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रख लेते हैं। जब तक हमारी अपेक्षाओं की पूर्ति होती रहती है, हमारे मन में प्रसन्नता बनी रहती है। जैसे ही अपेक्षाओं की पूर्ति में बाधा पहुँचने लगती है, हमारा मन खिन्न हो जाता है। बेटा जब तक पिता की सेवा कर रहा है, आज्ञाकारी बना है, उनकी आवश्यकताओं का ख्याल कर रहा है, श्रवणकुमार है। जैसे ही बेटे ने थोड़ी सेवायें कम की कि वह बेटा श्रवणकुमार नहीं। रावण का वंशज बन गया। क्या बात है ? यह तो द्वेषमूलक भावना है। एकत्व में अगर सेवा कर रहा है तो ज्यादा प्रसन्नता नहीं और यदि सेवा नहीं भी कर रहा है तो भी ज्यादा खिन्नता नहीं। आज के समय में बहुत जरूरी है आत्मकेन्द्रित होना। लेकिन ध्यान रखना, आज के लोग आत्मकेन्द्रित तो हैं पर स्वार्थ से प्रेरित होकर हैं। उनका दो प्रकार से आत्मकेन्द्रित होते हैं
1. अध्यात्मप्रेरित और 2. स्वार्थप्रेरित ।
अध्यात्मप्रेरित लोग आध्यात्मिकता से जुड़कर आत्मकेन्द्रित होते हैं। वे अपनी बुद्धि को आत्मा में स्थिर रखते हैं, किन्तु अपने व्यावहारिक कर्तव्यों से भी विमुख नहीं होते । कर्तव्य को कर्तव्य मानकर उसका दृढ़ता से पालन करते हैं, व्यावहारिक जीवन भी उतना ही मधुर होता है, जितना कि आध्यात्मिक जीवन पवित्र है। वह स्वयं को केन्द्र में रखकर ही सारे संसार का चक्कर लगाते हैं। उन्हें कोई कष्ट नहीं होता। लेकिन आज के लोग जो तथाकथित आत्मकेन्द्रित हैं, महज स्वार्थी लोग हैं। उनके आत्मकेन्द्रित होने का मतलब केवल स्वयं के हितों की पूर्ति करना, अपना मतलब साधना है। जिससे अपना मतलब सधे, उसके आगे-पीछे चक्कर लगाओ। मतलब खत्म हो गया तो अपना रास्ता देखो, किनारा काट लो। यह बड़ी जघन्य प्रवृत्ति है, नीच प्रवृत्ति है। एक प्रकार का अमानवीय कृत्य है। इससे व्यक्ति को बचना चाहिए। स्वार्थ से बचें, परमार्थ से जुड़ें। हमारा अध्यात्म हमें इस तरह का स्वार्थी नहीं बनने देता, जो दूसरों के हितों में बाधक बने।






