दिव्य विचार: देह बुद्धि टूटने पर ही परमार्थ तत्व का बोध- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: देह बुद्धि टूटने पर ही परमार्थ तत्व का बोध- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आज हमारी स्थिति कुछ भिन्न है। संसार में रहने वाला प्रत्येक प्राणी केवल शरीर के स्तर पर जीता है। हम शरीर की उत्पत्ति को अपनी उत्पत्ति और शरीर के विनाश को अपना विनाश मानते हैं। ऐसा मानकर चलने वाले व्यक्ति के जीवन में कभी आध्यात्मिक चेतना का आविर्भाव नहीं होता। जो गृहस्थ आध्यात्मिकता के तल में उतरते हैं उनकी दृष्टि शरीर से ऊपर उठ जाती है। वे देहबुद्धि से मुक्त होकर आत्मा के स्तर पर जीने के अभ्यासी हो जाते हैं। जहाँ देहबुद्धि टूटती है, भ्रांति छूटती है, वहीं सच्चे अर्थों में अपने भीतर के परमार्थ तत्व का बोध होता है और यही बोध एक क्षण हमें परमात्मा बनने में मददगार बन जाता है। इसी आत्मबोध से अपने भीतर के परमार्थ तत्त्व की अभिव्यक्ति होती है और कोई दूसरा मार्ग नहीं है। शरीर ऊपर का आवरण है। जो इस बुद्धि के द्वारा गोचर नहीं है, केवल अन्तर्मुखी चेतना से ही उसका अनुभव किया जा सकता है। शरीर तो ऊपर-ऊपर की चीज़ है। जैसे बिजली बहती है, प्रवाहित होती है, हमें वह दिखाई नहीं देती, उसका करंट हमें दिखाई नहीं देता, मात्र तार दिखाई देता है। तार तार है, तार में करंट नहीं। करंट की सत्ता भिन्न है और तार की सत्ता भिन्न है। दोनों मिलकर एक हो गए है। हम केवल तार को ही सब कुछ मानने का भ्रम पाल रहे हैं। संत कहते हैं - तार का ज़्यादा कोई महत्व नहीं, महत्त्व तो करंट का है। तार को देखते ही उसके भीतर के करंट का आभास हो जाता है। यही अन्यत्व की अनुभूति है। लेकिन क्या करें, यह विडम्बना है कि लोग तार को तो पहचानते हैं, उसके करंट की तरफ दृष्टि नहीं डालते। यही स्थिति आत्मा के साथ है। शरीर और शरीर की क्रियाएँ प्रयत्न हो सकती हैं, लेकिन आत्मा अनुभवगम्य है। हम तार को नहीं उसके भीतर के करंट को देखें। यही अन्यत्व की अनुभूति है। मैं केवल आत्मतत्व हूँ, बाकी संसार के जितने भी सम्बन्ध हैं, वे संयोग हैं। उस संयोग में आत्मबुद्धि का अभाव होने पर ही सच्चे अर्थों में अन्तर्मुखी चेतना का जागरण होता है और यही चेतना हमारी आध्यात्मिक जीवन की मूलाधार बनती है।