दिव्य विचार: मोह हावी होने पर शक्ति विकृत हो जाती है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: मोह हावी होने पर शक्ति विकृत हो जाती है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि दूसरा कर्म है - दर्शनावरण । दर्शनावरण कर्म को बड़े सुन्दर उदाहरण के माध्यम से समझाया गया है। जैसे आप यहाँ बैठे हैं, यदि दरवाजे पर आपको कोई रोक ले तो आप भगवान् के दर्शन नहीं कर सकोगे। दरवाजे पर रोक ले तो फिर जो भीतर बैठा है उस तत्त्व का दर्शन नहीं कर सकोगे। ऐसे ही दर्शनावरण कर्म प्रतिहारी की तरह आत्मदर्शन से वंचित करता है। हमारी देखने की शक्ति को तिरोहित करता है। तीसरा कर्म है - वेदनीय कर्म। हमें कभी सुख की अनुभूति होती है, कभी दुःख की। सुख और दुःख का अनुभव कराना ही वेदनीय कर्म का कार्य है। जो प्रतिपल कभी सुखी, कभी दुःखी बनाता है। इस कर्म के लिए उदाहरण दिया गया है - मधुलिप्त तलवार का। जैसे तलवार पर शहद लपेट दी जाए और शहद लपेटी तलवार को कोई चाटे तो चाटते वक्त मिठास की अनुभूति तो होती है, लेकिन उसके साथ-साथ जिह्वा कट भी जाती है, जिससे रक्त की धार भी बहती है। ऐसे ही ये सांसारिक सुख हैं, जो एक पल का सुख और बहुत काल का दुःख देते हैं, जो भोगते समय मधुर और विपाक में कष्टदायी होते हैं। यह वेदनीय कर्म है। इसके बाद का कर्म है मोहनीय कर्म। यह सब कर्मों का राजा है। सबसे खतरनाक कर्म है। यह हमारे आचार और विचार की शक्ति को विकृत करता है। यह हमारे चिन्तन को बिगाड़ता है। चरित्र को बिगड़ता है। इसका प्रतीक बनाया है मदिरापान को । जैसे कोई व्यक्ति मदिरापान कर लेता है. तो शराब पीने के बाद उसे, होश-हवाश नहीं होता। सुधबुध नहीं रहती। अच्छे-बुरे का विवेक नहीं रहता । वह चाहे जो कुछ भी कर लेता है, बस यही स्थिति मोह की है। जब तक जीव पर मोह हावी होता है तब तक अपनी असलियत का ध्यान नहीं होता। अपनी सुधबुध खो जाती है। आचार और विचार की शक्ति विकृत हो जाती है।