दिव्य विचार: क्रोध और द्वेष तुम्हारा स्वभाव नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि यह राग तुम्हारा स्वभाव नहीं, द्वेष तुम्हारा स्वभाव नहीं, क्रोध तुम्हारा स्वभाव नहीं, मान तुम्हारा स्वभाव नहीं, माया-लोभ तुम्हारा स्वभाव नहीं। केवल मोह के वशीभूत होकर विभाव को अपना स्वभाव मान लिया है। तुम्हारा स्वभाव तो निर्मल है। जैसे जल का स्वभाव शीतलता है। जल स्वभावतः शीतल होता है। लेकिन जब अग्नि का संयोग होता है तो जल उष्ण बन जाता है। जल उष्ण दिखता जरूर है किन्तु उस जल का स्वभाव शीतल ही बना रहता है। जल कब तक उष्ण बना रहेगा ? जब तक नीचे से अग्नि का संयोग बना रहेगा। शान्ति तुम्हारा स्वभाव है । समता तुम्हारा स्वभाव है। क्रोध, मान, माया, लोभ तुम्हारा स्वभाव नहीं है। वे तो विकार हैं। ये कब तक रहेंगे ? जब तक क्रोध की आँच बनी रहेगी, क्रोधी बने रहोगे। मान की आँच बनी रहेगी, मानी बने रहोगे। क्रोध, मान, माया और लोभ की आँच में जब तक पड़े रहेंगे, तब तक तुम कभी क्रोधी, कभी मानी, कभी लोभी, कभी मायावी बने रहोगे। उस आँच को जब हटाओगे तो अपने आप शान्त हो जाओगे। ठंडा करने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता। गर्म करने के लिए तो प्रयास करना पड़ता है। समता के लिए प्रयास की जरूरत नहीं है। विषमता प्रयास से आती है। विषमता संयोग से आती है, जो विभाव की देन है। उस विभाव को हटा दें, स्वभाव तो अपने आप आ जाता है। जब तक हमारी यह वैभाविकी परिणति बनी रहेगी, तब तक हम कर्म के बन्धन से बच नहीं सकते। आध्यात्मिक चिन्तन कहता है- विचार करो, अनादि से इसी कर्म की गिरफ्त में फँसे हो, बंधे आ रहे हो। अब अपनी चेतना को जगाओ। कर्मों से अपनी भिन्नता को समझो। उन्हें दर करने की कोशिश करो। उनके लिए तुम्हें एक बड़ा उपक्रम करना पड़ेगा। लेकिन हमारी स्थिति दूसरी है। आपके घर में कोई बिना बुलाये मेहमान आ जावे और उसकी रातदिन आप खातिरदारी करो। उनकी परिचर्या में जुटे रहो, तो क्या कभी वह आपके घर से बाहर जाने का नाम लेगा ? बिना बुलाया मेहमान है और आपकी सेवा-टहल देखकर कौन बाहर जाने के लिए तैयार होगा ?






