दिव्य विचार: दूसरे के अनुभव से भी सीखें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: दूसरे के अनुभव से भी सीखें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि कोई ज़रूरी नहीं कि सब कुछ खुद के अनुभव से जाना जाये। बहुत कुछ चीजें ऐसी हैं, जो दूसरों के अनुभव से ही जानी जाती है। मुझसे एक बार एक सज्जन कह रहे थे- महाराज ! आपने दुनिया देखी नहीं, फिर ऐसी बातें कैसे करते हैं ? मैं साठ बरस का हो गया। जो संसार का अनुभव आप नहीं कर पाये, आप बता दें तो आपने कहाँ से पाया ? हमने कहा- आप लोगों को देखकर । जहर खाने वाला मर जाता है। यह हमने सुना है, अनुभव नहीं किया। कभी जहर खाके, मर के नहीं देखा। लेकिन सबको पता है कि जहर खाने वाला मरता है। इसलिये दूसरों के अनुभव से भी बहुत कुछ सीखा जाता है। मैं कह रहा था कि मिठाई खाने से नशा बढ़ता है, खटाई खाने से नशा उतरता है। बस नशा उतारना चाहते हो कि बढ़ाना। नशा तो बढ़ा ही रहे हो। आप जो सेवन कर रहे हो, वह केवल तुम्हारे मोह के नशे को बढ़ाने वाला है। उसको कम करना चाहते हो तो घण्टे भर की सत्संग रूपी खटाई खा लो, तो धीरे-धीरे स्वयमेव कम हो जायेगा।, वीतरागता की खटाई का जल तुम जैसे ही अनुपान करोगे, तुम्हारा नशा पल में उतर जाएगा। जैसे ही तुम्हारा नशा उतरेगा, स्वरूप बोध पाओगे । भव-भव का भ्रमण खत्म हो जायेगा। कुछ लोग कहते हैं -महाराज ! प्रवचन तो सुनते हैं, पर कुछ असर ही नहीं होता। तो क्या फायदा? बुराई कुछ नहीं है, ध्यान रखना। करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान । श्रवण का भी बहुत असर होता है। यह बात सच है कि सुनने में कोई बुराई नहीं है। सुनने वाले का भी फायदा होगा। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों। क्या पता तुम्हें कब कौन-सा डोज (Dose) काम कर जाये। अरे भैया ! जितनी पुरानी बीमारी है उतना ही पुराना इलाज। जैसे क्रोनिक बीमारी है तो उसका एक दिन में इलाज कैसे संभव है ? अनन्तकाल का चला आ रहा है, आज का नहीं है। साल-छः महीने पुरानी बीमारी को खत्म करने के लिए तुम्हें लम्बा इलाज लेना पड़ता है, तो यह भव-भवान्तरों की बीमारी है। इसका इलाज भी लम्बे समय तक चलेगा।